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Thursday, September 22, 2022

निर्भय होकर बढ़ने से ही मिलेगी सफलता

 

निर्भय होकर बढ़ने से ही मिलेगी सफलता

जब हमारे मन से हारने का भय समाप्त हो जाता है,

तब लक्ष्य प्राप्ति का मार्ग स्वत: ही सरल हो जाता है।

मंजिलों को पाने की लालसा सभी में होती है।  लेकिन विजय का स्वाद चख पाना हर किसी के लिए संभव नहीं होता है। कारण मात्र, उसकी ओर निर्भय होकर बढ़ने का साहस न जुटा पाना और धैर्य के साथ सतत प्रयास के मार्ग से भटक जाना है। आम तौर पर दिन भर में किसी भी आम मनुष्य के मन में असंख्य विचार आते हैं। कुछ सकारात्मक होते हैं, तो कुछ नकारात्मक। जहाँ एक ओर सकारात्मक विचार हमें सदैव अँधेरे से प्रकाश की ओर ले जाने का कार्य करते हैं वहीं दूसरी ओर नकारात्मक विचार हमें सदैव इसके ठीक विपरीत जाने के लिए प्रेरित करते हैं। सृजन, सकारात्मक विचारों का ही एक भाग है जो हमें नई उम्मीद के सहारे कुछ नया करने के लिए कहता है, फिर हमारा मन और मस्तिष्क इस दिशा में क्रियाशील हो जाते हैं और नए विचारों की उत्पत्ति होनी शुरू हो जाती है। यह सभी विचार हमें, हमारे मन और मस्तिष्क में बने लक्ष्य की ओर बढ़ने की सलाह देते हैं और उसके लिए विभिन्न प्रकार के मार्ग भी प्रदर्शित करते हैं। इसके साथ ही हमारे मन में एक और भाव उत्पन्न होने लगता है जिसे नकारात्मक भाव कहते हैं। यह हमें पीछे की ओर धकेलता है और हमें मार्ग में आने वाली बाधाओं और विपदाओं के प्रति सूचित करता है। किसी भी कार्य को आरम्भ करने से पहले उचित प्रकार उसके दोनों पहलुओं पर ध्यान से चिंतन और मनन करना चाहिए, जो एक स्वाभाविक क्रिया है। परन्तु इस क्रिया का परिणाम पक्ष और विपक्ष दोनों ओर हो सकता है। इसके लिए यह परम आवश्यक है कि हम अपने विवेक के सामर्थ्य के साथ मस्तिष्क से उचित निर्णय लें।

यह प्रक्रिया निरंतर चलने वाली है। यही हमारी आवश्यकताओं और लक्ष्य की प्राथमिकताओं को भी परिभाषित करती है। मनुष्य के जीवन में सफलता के तीन चरण होते हैं पहला चरण किसी भी कार्य को करने का मन बनाने के पश्चात् समस्त ध्यान को विकेन्द्रित करने वाले अवयवों को किनारे करते हुए उसको प्रारम्भ करने का साहस जुटा पाना है। दुसरा चरण वह है जब कार्य प्रारम्भ होने के बाद उसमें विभिन्न प्रकार की बाधाएं आनी शुरू होती हैं जो मन को हतोत्साहित करने का कार्य करती हैं । इससे भी अधिक प्रभाव हमारे समाज के गतिहीन और असमर्थ विचारों का आना कहीं न कहीं हमारे मनोबल को कम करता है। परन्तु कुशल व्यक्ति को इन सभी को अनदेखा करते हुए आगे बढ़ते जाना चाहिए। एक तीसरा चरण आता है जब हम अपने लक्ष्य के निकट पहुँच जाते हैं और हमारा सामना अब तक कि सबसे बड़ी मुश्किल के साथ होता है उस समय मन पूर्ण रूप से यह सोचने और मानने को मजबूर हो जाता है कि अब लक्ष्य की प्राप्ति असंभव है। जबकि मंजिल हम से कुछ कदम ही दूर होती है और यह लक्ष्य प्राप्ति की ओर अंतिम बाधा होती है। इस समय मन सर्वाधिक निराशा भरा होता है। कारण यह है कि प्रयास करते-करते धैर्य का बांध दुटने को व्याकुल है और जोखिम उठाने का साहस भी अब साथ छोड़ने को तैयार है। इस समय व्यक्ति को अपना समस्त बल और धैर्य का प्रयोग करते हुए  पूर्ण विश्वास के साथ बाधा पर टूट पड़ना चाहिए। ऐसा करने से मन की एकाग्रता का भाव और साहस बाधा से अधिक बलशाली हो जाता है और हम अपने निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त कर पाते हैं।

मनुष्य का जीवन चारों ओर से किसी न किसी भय से घिरा हुआ है। साइकिल चलाते हुए गिरने का भय, तैरना सीखते हुए डूबने का भय, स्कूल में अनुत्तीर्ण होने का भय, व्यापार में नुकसान का भय, घर में चोरी का भय, जीवन पर्यंत मृत्यु का भय । ऐसा नहीं है कि हम इनको नकारते हुए बिल्कुल लापरवाह हो जाए। जिस प्रकार आसमान में बादल हमें बारिश के प्रति सचेत करता है ठीक उसी प्रकार यह हमें आने वाली बाधाओं के प्रति सचेत करने के लिए है। यदि हम इसी भय में उलझें रह जाते हैं तब न सिर्फ अपनी कार्य क्षमता प्रभावित होती है अपितु वह लोग जो हमें अपना प्रेरणा स्त्रोत मानते हैं, उनका मनोबल भी कम हो जाता है। कार्यों में मिली असफलता जीवन में एक अनुभव है जो हमें अतिरिक्त सुधार कर पुनः लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करती है । यदि चंद्रगुप्त मौर्य हार के भय से युद्ध नहीं करता तो कभी भी विश्वविजेता सिकन्दर को नहीं हरा पाता। यदि नेता जी सुभाष चन्द्र बोस अंग्रेजों से डर जाते तो कभी भी आजाद हिन्द फ़ौज खड़ी नहीं कर पाते। यदि जीवन का भय होता तो एक पैर से अपंग अरुणिमा सिन्हा कभी भी विश्व की सबसे ऊँची पर्वतीय चोटी "एवरेस्ट" पर नहीं चढ़ पाती। ऐसे असंख्य उदाहरण है जिन्होंने अपने हौंसलें से निर्भय होकर सफलता पायी है।

इतिहास साक्षी है कि जिन्होंने भय के आवरण से निकलकर अपने लक्ष्यों पर ध्यान केन्द्रित किया है। विजय का स्वाद भी सिर्फ उन्होंने ही चखा है।  

   

- प्रशान्त मिश्र

(लेखक सामाजिक चिन्तक और विचारक हैं )

ग्रेटर नॉएडा, उत्तर प्रदेश

सम्पर्क सूत्र :-7599022333

Monday, September 19, 2022

अपनत्व का भाव है मातृभाषा हिन्दी

 

अपनत्व का भाव है मातृभाषा हिन्दी


जब मन ख़ुशी और आनंद से सराबोर हो तो स्वर्ण की चमक व विजय रथ की धमक भी फींकी सी नजर आती है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार किसी दूध मुहें बच्चे को जो ख़ुशी अपनी माँ की गोद में आती है, जो सकून ममता के आँचल में आता है, उसको यदि विश्व की कोई भी मूल्यवान वस्तु ला कर दी जाये तो वह ममता की ओर जाने के लिए रो पड़ेगा। ठीक उसी प्रकार जब सर्व जगत में किसी अन्य भाषा का प्रभुत्व हो आपकी दिनचर्या भी पराएँ शब्दों से बंधी हो और स्वयं को “लोहे की बेड़ियों” में जकड़ा हुआ महसूस करें और लगे कि..

“पाश्चात्य” की झूठी धरा पर, “माथ” खोजती बिंदी

“सिंध” के ही घर आज, बेगानी हो गई मेरी “हिन्दी”

              हम कहाँ जा रहे हैं, अपनी सभ्यता को छोड़कर अपनी संस्कृति को छोड़कर? मात्र वो भी किसलिए की हम परायों की ली हुई वस्तु और भाषा पर गर्व महसूस कर सकें। परन्तु क्या यह गर्व की भावना सिर्फ दूसरों को प्रदर्शित करने के लिए नहीं है, क्या आपका मन अपने संस्कार को मानने के लिए नहीं करता? करता है, परन्तु कहीं न कहीं एक अँधेरे की पोटली में छिपा हुआ भय हमें आपने संस्कार व अपने ही घर में अपनी भाषा की अवहेलना करने को मजबूर कर देता है।

             यदि यह सत्य है , तो अपने झूठी दुनिया की “काल्पनिक बाधा” से बाहर निकलिए और एक आजाद पंछी की तरह खुले नील गगन में उड़ते जाइए जहाँ न कोई बाधा हो, जहाँ हम खुलकर उड़ सकें ,और ऊपर और ऊपर बस उड़ते जाइए। उस आकाश में जो ख़ुशी और आनंद का अनुभव होगा वही हिन्दी भाषा के लिए जीवन में “अपनापन” है , जो एक माँ कि तरह शिशु को गोद में चैन  की नींद सुला देता है।

भारत के संविधान के भाग १७ के अनुच्छेद ३५१ में हिंदी भाषा के विकास के लिए दिए गए निर्देशों में लिखा है कि  "संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किये बिना हिन्दुस्तानी में और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहां आवशयक और वांछनीय हो उसके शब्द भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत से और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे।"

संविधान सभा ने १४ सितम्बर १९४९ को हिंदी को राजभाषा का दर्जा प्रदान किया था इस पावन दिवस की स्मृति में प्रतिवर्ष १४ सितम्बर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है इसी के साथ १ सितम्बर से १५ सितम्बर तक हिन्दी पखवाड़ा मनाया जाता है जिसके अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम हिंदी भाषा को ध्यान में रखकर आयोजित किये जाते हैं। हिंदी दिवस का आयोजन करना, कुछ दिन हिंदी की महिमा का गुणगान करने मात्र से क्या हमारी भाषा को वैभव के परम शिखर पर ले जा सकते है क्या? यदि नहीं तो ऐसे झूठे दिखावे करने मात्र से हम अपने मन को दिलासा तो दे सकते हैं लेकिन जब हम स्वयं बाद में अंग्रेजी भाषा को अपने आत्मसम्मान से जोड़कर देखने लगते हैं तो कहीं न कहीं ये हमारा स्वयं के साथ किया हुआ छलावा है, जो न सिर्फ हमने स्वयं के साथ किया है अपितु हम अपने आने वाली पीढ़ियों के साथ भी कर रहे हैं। जिसके परिणाम काफ़ी भयानक और कष्ट दायी होंगें। कार्यक्रम आयोजित करने मात्र से हिंदी भाषा की स्थिति नहीं परिवर्तित होने वाली है इसे हमें अपने निज जीवन में उतार कर इसके लिए व्यापक और ठोस कदम उठाने होंगें।

क्या आपने कभी किसी और देश के राष्ट्र प्रतिनिधि को भारत में आकर हिन्दी में भाषण देते हुए सुना है आप कहेंगें न, क्यों? क्या कारण है?  कि वो दुसरे देश में जा कर अपनी भाषा को बोलने के लिए क्षणिक भर भी विचार नहीं करते तो क्या कारण हैं कि भारत देश का प्रतिनिधित्व करने वाले लोगों को अंग्रेजी भाषा में अपने विचार रखने पड़ते हैं कहीं न कहीं यह हिंदी भाषा के प्रति उनका दोरुखा व्यवहार है। इसके परिवर्तन की आवश्यकता है। जब भारत देश का कोई भी प्रतिनिधि किसी भी वैश्विक मंच पर हिन्दी भाषा में वार्तालाप करता है तो यह सिर्फ उनके लिए गौरव की बात नहीं होती अपितु उस मंच से जुड़ें समस्त समस्त दुनिया में निवास करने वाले भारत वासियों और हिन्दी प्रेमियों के ह्रदय में उनकी मातृभाषा के सम्मान की बात होती है।

४ अक्तूबर १९७७ को जब अटल बिहारी वाजपयी जी ने युएन के ३२ वें अधिवेशन में हिंदी भाषा में भाषण दिया तब सदन तालियों की आवाज से गूंज उठा। मानों समस्त विश्व किसी वैश्विक मंच पर हिंदी भाषा की आवाज सुनने की वर्षों से प्रतीक्षा कर रहा हो। वर्तमान समय में जब कभी भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अन्तराष्ट्रीय मंचों पर हिन्दी भाषा में अपने विचार व्यक्त करते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि हमारा कोई अपना ही हमारे लिए कुछ कह रहा है। आखिर हिन्दी भाषा जैसा अपनत्व पाश्चात्य शैली की भाषा में हो ही नहीं सकता। हिन्दी संस्कृति की भाषा है जो पारिवारिक सम्बन्धों को जोड़ती है। अपनों से अपनत्व का बोध कराती है। आज भी चाचा शब्द अपने और अंकल परायों का बोध कराता है। हम सभी ने ऐसा महसूस किया होगा। ऐसा क्यों? जरुर सोचिएगा।

आप अंग्रेजी सीखें, उर्दू, तमिल,मलय, बंगाली,मंदारिन, स्पेनिश,अरबी, फ्रेंच विश्व में बोली जाने वाली कोई भी भाषा सीखें यह आपके ज्ञान की क्षमता को प्रदर्शित करेगी लेकिन मातृभाषा हिन्दी की अवहेलना करना और उसको महत्त्व न देकर अंग्रेज़ी को महामंडित करना कहीं न कहीं आपका अपनी भाषा के प्रति अन्याय होगा।

 आइये! हम भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के “नया भारत” के सपने के लिए संकल्प लें, कि...

                   “जब हम भारत देश की आजादी का शताब्दी महोत्सव वर्ष २०४७ में मना रहें होंगे, जब सम्पूर्ण विश्व भारत के नेतृत्व में आगे की ओर बढ़ चला होगा, हम उस सुनहरे पल में अपनी जननी की भाषा हिन्दी को विश्वपटल के सिंघासन पर विराजमान होता देखेंगे” इस संकल्प को सिद्ध करेंगे।

- प्रशान्त मिश्र

(लेखक  सामाजिक  चिन्तक और विचारक हैं )

मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश

   

Saturday, August 20, 2022

लेख-मौलिक अधिकार के साथ कर्तव्यों की भी हो चर्चा, डॉ. प्रशान्त कुमार मिश्र


मौलिक अधिकार के साथ कर्तव्यों की भी हो चर्चा

 

संविधान में दिए गए मौलिक अधिकार याद रहते हैं,

लेकिन अक्सर हम मौलिक कर्तव्य भूल जाते हैं।



भारत देश का संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। यह देश का सर्वोच्च विधान है। संविधान की प्रस्तावना के अनुसार भारत एक सम्पूर्ण प्रभुत्वसंपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य है। संविधान के आधार पर ही देश की समस्त गतिविधियाँ संचालित की जाती हैं। संविधान के भाग -3 में अनुच्छेद 12 से लेकर अनुच्छेद 35 तक देश की जनता को प्राप्त मौलिक अधिकारों का वर्णन किया गया है। चाहे वह समानता का अधिकार हो अथवा अनुच्छेद 19 में वर्णित बोलने की स्वतंत्रता का अधिकार, किसी भी क्षेत्र में आने जाने की स्वतंत्रता, शांतिपूर्वक बिना हथियार के एकत्रित होकर सभा करने की स्वतंत्रता इत्यादि जैसे कई अधिकार देश के संविधान के द्वारा हमें प्रदान किये गए हैं।

जिस प्रकार संविधान के द्वारा देश की जनता के लिए मौलिक अधिकार प्रदान किए गए है ठीक उसी प्रकार वर्ष 1976 में 42 वें संशोधन के द्वारा मौलिक कर्तव्यों को संविधान में जोड़ा गया जिसे भाग 4 (क) में अनुच्छेद 51 (क) के अंतर्गत रखा गया। देश की जनता से 11 मौलिक कर्तव्यों के पालन करने की आशा की गई। जिसमें पहला कर्तव्य संविधान का पालन करने और उसके आदर्शों संस्थाओं, राष्ट्र ध्वज और राष्ट्र-गान का आदर करने के लिए कहा गया है। साथ ही भारत देश की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करने, सभी लोगों में समरसता की भावना उत्पन्न हो ऐसा कर्तव्य भी जनता से निर्वाह करने की लिए अपेक्षा की गई है। हमारी सामाजिक संस्कृति की गौरवशाली परम्परा को समझना और सार्वजानिक सम्पतियों को सुरक्षित रखने जैसे कुल 11 मौलिक कर्तव्य संविधान में दिए गए हैं और साथ ही यह अपेक्षा भी की गई है कि देश की जनता इनके महत्त्व को समझेगी और पूर्ण निष्ठा और ईमानदारी के साथ इनका पालन करेगी।

लेकिन सदैव यह देखने में आता है कि देश के संविधान के द्वारा जनता को दिए गए मौलिक अधिकार सभी को याद रहते हैं और इन अधिकारों की दुहाई देकर कुछ लोग अपने मन में छुपे द्वेष और मानसिक मल को सार्वजानिक मंच पर निकाल कर अशांति का माहौल पैदा कर देते हैं। गत कुछ समय से जब से सोशल मिडिया अधिक सक्रिय हुआ है तब से इसके माध्यम से लोगों ने बिना कारण और परिणाम को जाने, समझें शब्दों की सीमा को भी पार कर दिया है जिसके परिणाम स्वरुप  दूषित विचार और अर्थहीन विषय एक लम्बे समय तक प्रचारित और प्रसारित होते रहते है। देखते ही देखते जिस विवाद को स्थान विशेष पर ही रोका जा सकता था वह बात सम्पूर्ण देश में बवाल का रूप धारण कर लेती है। जब कभी हम देश में अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर अपने मौलिक अधिकारों का दुरपयोग कर देश की शांति और समरसता को भंग करने का प्रयास करते हैं। तब हम शायद उसी संविधान में दिए गए और जनता से अपेक्षा किए गए मौलिक कर्तव्यों को या तो जानने का प्रयत्न नहीं करते अथवा हम इनके विषय में जानकर भी अंजान बन्ने का दिखावा करते हैं। यह दिखावा उस समय और अधिक आश्चर्यचकित कर देने वाला लगता है जब हम किसी शिक्षित अथवा विद्वान व्यक्ति को ऐसा करते हुए देखते हैं।

जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण आपने जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के द्वारा अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश विरोधी नारे लगाते हुए देखा। यह स्थिति उस समय और अधिक दयनीय हो जाती है जब देश के प्रभावी बुद्धिजीवी वर्ग के द्वारा इस प्रकार की घटनाओं का समर्थन मिलता है। इसी प्रकार सीएए और एनआरसी को लेकर देश में हुए विरोध प्रदर्शन को देखा जा सकता है।  ऐसा ही एक ताजा उदाहरण है नए कृषि कानून को लेकर चल रहे विरोध का। देश का संविधान आपको अपनी बात रखने की स्वतंत्रता प्रदान करता है आपको किसी अन्यायपूर्ण कार्य के लिए विरोध करने की भी आजादी प्रदान करता है। परन्तु उस आजादी के नाम पर देश में अराजकता का माहौल पैदा करने का प्रयास करना यह किसी भी स्थिति में न्यायसंगत नहीं प्रतीत होता है। सड़कों पर जाम लगा देना, ट्रेनों को रोक देना, टायर जलाना, जबरदस्ती दुकानों में घुसकर उसे बन्द कराने का प्रयास करना ये गलत है। कई बार देश में यह भी देखा जाता है कि हम विरोध और प्रदर्शन के नाम पर हर वो काम करने से नहीं चुकते जो किसी भी सूरत में एक देश के जिम्मेदार नागरिक को शोभा नहीं देता है। किसी व्यक्ति की हत्या कर देना, घरों, दुकानो को लुट लेना, वाहनों को आग के हवाले कर देना और बुद्धिजीवी वर्ग के द्वारा इनके समर्थन में भी उतर आना यह किसी भी रूप से हमारी स्वतंत्रता तो नहीं कहा जा सकता।

हाँ.. हमें अपने अधिकार पता होने चाहिए लेकिन सिर्फ अधिकारों को जानना और कर्तव्यों को अनदेखा कर देना क्या यह उचित है। जिस प्रकार हम संविधान में दिए गए अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हैं ठीक उसी प्रकार हमें संविधान में दिए गए अपने राष्ट्र के प्रति मौलिक कर्तव्यों के लिए भी जागरूक होना होगा। किसी भी गलत कार्य को देखकर उसका विरोध करना यह एक स्वभाविक क्रिया है और यह उचित भी है। लेकिन  विरोध के अन्य माध्यम हो सकते हैं, जो माध्यम देश में अराजकता और अशांति का माहौल बनाये ठीक नहीं है। जिस देश ने हमें रहने के लिए स्थान दिया भूख मिटाने के लिए भोजन दिया उसी देश के खिलाफ़ नारे लगा कर दुष्प्रचार कर कहीं न कहीं हम स्वयं को अपमानित कर रहे हैं। भारत देश सदियों से है इसकी संस्कृति, परम्परा, हजारों वर्षों से अपने अन्दर जिस भाव को समेटे अपनी संतानों का लालन-पालन कर रही है। वैसे ही आने वाले समय में भी करती रहेगी। हमें अपने राष्ट्र के प्रति दायित्वों और जिम्मेदारी को समझना होगा। संविधान में दिए गए मौलिक कर्तव्यों को पूर्ण रूप से जानना व पूर्ण निष्ठा के साथ पालन करना सभी का नैतिक कर्तव्य है । लेकिन सिर्फ एक पहलू को जानकर अन्य बातों की अवहेलना करना यह एक छलावा है जिसे हम दूसरों को दिखा कर स्वयं को दोषी बना रहे हैं।

-डॉ. प्रशान्त कुमार मिश्र

राम गंगा विहार, मुरादाबाद

उत्तर प्रदेश


 

Friday, August 19, 2022

Article- आत्मनिर्भर भारत का आधार स्तम्भ गाँव Village, the Pillar of Self-Reliant India

आत्मनिर्भर भारत का आधार स्तम्भ गाँव 

 

         जो भी आया वो यहीं का होकर रह गया। इसकी मिट्टी में ही कुछ खास है। जिसकी महक मात्र से ही दुनिया भर के लोग खींचे चले आते हैं और अपना घर, परिवार, व्यापार सब कुछ छोड़ कर यहीं के रंग में रंग और बस  जाते हैं। विश्व के विभिन्न देशों से भारत को जो खास बनाती है वह है यहाँ की संस्कृति। जिसमें प्रति पल, पग अपनत्व की भावना झलकती है।  मनुष्य का मनुष्य के प्रति प्रेम, सुख दुःख का साथ, ह्रदय में प्रक्रति के प्रति समर्पण का भाव, जीव-जन्तुओं के प्रति ममता और करुणा, यह यहाँ की विशेषता है। इन सबका केंद्र बिन्दु यहाँ के गाँव हैं। जो हजारों वर्षों से भारतीय परम्परा और संस्कृति को अपने अन्दर समेटे हुए हैं। जिसकी पीढ़ियाँ सदियों से अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए अपनी अगली पीढ़ी को यह अनमोल धरोहर सौंपती चली आ रही हैं।

भारत देश की संस्कृति ने सदैव सभी को जोड़ने का प्रयास किया । चाहे वह व्यक्ति को व्यक्ति से जोड़कर परिवार का निर्माण हो अथवा प्रकृति के अनमोल उपहारों को मनुष्य की भावनाओं से जोड़कर रखना और उसका संरक्षण करना। इस संस्कृति ने जीव-जन्तु, वृक्ष, नदी, पवन, वन, पर्वत, भूमि, सूर्य, चंद्रमा, गृह, नक्षत्र, सभी को जोड़कर रखा है। यहाँ तक कि इस संस्कृति ने हमें हमारे पूर्वजों से भी ह्रदय से जुड़ें रहने का मार्ग दिखाया है। यह संस्कृति अधिकार नहीं, त्याग सिखाती है। यह जीवन जीना सिखाती है, अपने लिए नहीं दूसरों के लिए।

हम कहीं भी जा सकते हैं। कुछ भी कर सकते हैं। चाहे तो सृजन कर सकते हैं चाहे तो विध्वंस कर सकते हैं। इसके लिए हम पूर्ण रूप से स्वतंत्र हैं। परन्तु एक बात  ध्यान देने योग्य है कि हम यदि उचित वस्तुओं का सृजन करते हैं तो यह सृजन हमारे लिए तो भी उपयोगी होगा ही साथ ही समाज के लिए भी और यदि हम अनुचित वस्तु का सृजन करते हैं तो यह समाज के लिए घातक होगा लेकिन कहीं न कहीं वह हमारे लिए भी कष्टदायी होगा। वर्तमान समय में जब समस्त विश्व आधुनिकता और विकास की दौड़ में तीर्व गति से भाग रहा है तब नित्य प्रतिदिन नवीन अविष्कार हो रहे हैं। जिन्होंने हमारे जीवन को सरल व सुविधाजनक बनाया है। साथ ही कुछ अविष्कारों ने हमारे जीवन को गलत दिशा भी दी है जिसके कारण हम विनाश की ओर  भी बढ़ रहे हैं। भारत देश प्राचीन समय से ही आत्मनिर्भर रहा है। यहाँ की जलवायु जीवन जीने के लिए उत्तम है यहाँ की नदियाँ न सिर्फ हमारी प्यास बुझाती है साथ ही जमीन को कृषि के लिए उपजाऊ बनाती हैं जिसका प्रयोग हजारों वर्षों से मानव जीवन की प्राथमिक आवश्यकता को पूरा करने के लिए किया गया है । भारत देश के पास प्राचीन समय से ही जीवन जीने हेतु सभी प्राकृतिक संसाधन मौजूद रहे हैं । गत काफ़ी समय तक जिसे आप मुगलों के शासन काल से अंग्रेजों के शासन काल तक का समय कहते हैं इस समय देश के संसाधनों और कौशल का बड़ी मात्रा में दोहन और ह्रास हुआ । फिर भी हमारा देश अपनी जीवन शैली के अनुरूप अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में अपनी संस्कृति के कारण सदैव सक्षम रहा। देश के गाँव व किसानों ने सभी का पेट भरने और हर भूखे व्यक्ति के मुहँ में निवाला देने में अपनी प्रतिबद्धता दिखाई।

वैश्वीकरण के इस युग में हमें विश्व के समस्त देशों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना होगा। हमें आधुनिक तकनीकों को अपनाना होगा, यह समय की आवश्यकता है यदि हम इसे नहीं अपनाएंगे तो हम विश्व पटल पर पीछे रह जायेंगें। लेकिन विकास की अंधी दौड़ में कहीं न कहीं हमने अपने जीवन शैली के साथ समझौता किया । हमनें प्रकृति के साथ समझौता किया। हमनें अपनी संस्कृति और सभ्यता को अनदेखा किया। हमने नगर बनाएं हमने बड़े-बड़े शहर बनायें।  जिन्होंने गाँव के परिवेश से दूरी का मार्ग प्रशस्त किया। इसके साथ ही पाश्चात्य शैली के प्रभाव के कारण देश का विभाजन शहर और गाँव के रूप में हो गया। शहर जो आधुनिकता से परिपूर्ण है जहाँ सुख सुविधा है। गाँव जो अपेक्षाकृत पिछड़ा है ऐसा भाव उत्पन्न हुआ है। युवाओं ने रोजगार की तलाश में शहरों का रुख करना प्रारम्भ किया। इसने न सिर्फ देश के सम्रद्ध बड़े परिवारों को छोटा और एकाकी में परिवर्तित कर दिया । साथ ही आधुनिकीकरण में बाजारीकरण का मिश्रण होने से हमारी गाँव संस्कृति भी प्रभावित हो रही है। मानव जीवन का अनमोल उपहार हमारें परिवार और रिश्ते बाजारीकरण के मोहजाल में समाप्त होते जा रहे हैं। हम अपनी सभ्यता, परम्परा, रीती-रिवाजों से दूर हो रहे हैं। हमारे मध्य की अपनत्व की भावना और वासुदेव कुटुम्बकम् का भाव का रंग हल्का हो रहा है। हम आधुनिक तकनीक का प्रयोग करने के स्थान पर उन पर आश्रित होते जा रहे हैं। जिसके आने वाले समय में भीषण परिणाम सामने आयेंगें।

भारत देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को साकार करने की पहल की है। जिसमें देश को उत्पादन और सेवा के क्षेत्र में पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रयास किये जा रहे हैं। लेकिन आत्मनिर्भर भारत का सपना सही अर्थों में तब तक साकार नहीं हो सकता जब तक देश के प्रत्येक गाँव अपनी जरुरी आवश्यकता की पूर्ति के लिए आत्मनिर्भर न हो जाएँ। देश के प्रत्येक गाँव में समस्त मूलभूत सुविधा उपलब्ध न हो जाएँ। यहाँ एक बात सदैव ध्यान देने योग्य है कि हमें ग्रामीण जीवन शैली और संस्कृति के अनुरूप ही उन्हें आधुनिक तकनीक के द्वारा विकसित करना है। हमें हमारी आधुनिकता को प्रकृति के साथ जोड़कर रखना होगा। हमें प्रकृति से मिले प्राकृतिक संसाधनों को आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित करना होगा। आधुनिकता का अर्थ है जीवन को सरल बनाना न कि आश्रित होना। न ही पाश्चात्य शैली और बाजारीकरण के भाव से परिपूर्ण जीवन। यदि हम यह उचित प्रकार कर सकें तभी हम आत्मनिर्भर भारत का सपना साकार कर सकेंगे। अन्यथा देश आत्मनिर्भर और विकसित तो होगा लेकिन अपनी पहचान "गौरवशाली संस्कृति" और "सभ्यता" को खो देगा।

 

                                                                                                      - प्रशान्त मिश्र

(लेखक सामाजिक चिन्तक और विचारक हैं)

ग्रेटर नॉएडा, उत्तर प्रदेश


Thursday, August 18, 2022

Article आत्मनिर्भरता के लिए गुणवत्ता जरुरी Quality is Important for Self-Reliance

 आत्मनिर्भरता के लिए गुणवत्ता जरुरी

 


कोरोना संकट के बीच देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा भारत को आत्मनिर्भर बनाने का नया मिशन सामने रखते हुए 20 लाख करोंड़ के आर्थिक पैकेज का ऐलान किया गया । जिसका सम्पूर्ण देश में उत्साह के साथ स्वागत किया गया । भारत देश को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में प्रयास करनास्वदेशी वस्तुओं के प्रति जागरूक करनाप्रचार करनायह सही है लेकिन इसके विभिन्न पहलुओं पर भी चर्चा करना अत्यंत आवश्यक है। प्रधानमंत्री ने देश के नाम अपने संबोधन में देश के लिए एक बड़े आर्थिक पैकेज की घोषणा करते हुए कहा कि कोरोना के संकटकाल में अर्थव्यवस्था को रफ़्तार देने के लिये ये पैकेज अहम् भूमिका निभा सकता है साथ ही उन्होंने कहा कि दुनिया की मौजूदा परिस्थिति भारत के लिए एक अवसर बन सकती है ऐसे में हमें आत्मनिर्भर होना जरुरी है। अपने दिए गए उद्बोधन में उन्होंने लोकल मैन्यूफैक्चरिंगसप्लाई चेन का महत्त्व भी समझाया और प्रत्येक भारत के नागरिक से लोकल प्रोडक्ट के लिए वोकल बनने की अपील की ।

ऐसा नहीं है कि यह विचार उनके दिमाग में कोरोना महामारी के समय बिगड़ती अर्थव्यवस्था को देखकर आयाजब प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी का राजतिलक हुआ और पूर्ण रूप से देश में भारतीय विचारधारा की सरकार बनी उस समय उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा था हमें जीरों डिफेक्ट प्रोडक्ट बनाने होंगेंहमें वस्तुओं की गुणवत्ता पर ध्यान केन्द्रित करना होगा तभी हम भारत को विश्व स्तरीय उत्पाद का केंद्र बना पायेंगें। लेकिन एक तरफ उनका देश के स्वदेशी उत्पाद को बढ़ाने का प्रयास दिखाई देता हैं वहीं देश में एफडीआई (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) की वर्तमान स्थिति सभी के सामने है । केंद्र सरकार रक्षाफार्मानागरिक उड्डयन भारत में बने खाद्य पदार्थों में 100 प्रतिशत विदेशी निवेश की मंजूरी 2015 में ही दे चुकी है । भारत वर्ष 2019 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) आकर्षित करने वाले शीर्ष 10 देशों में शामिल रहा । इस दौरान भारत में एफडीआई 16 प्रतिशत बढ़कर 49 अरब डॉलर पहुँच गई । कहीं विदेशी पूंजी के प्रति आकर्षण देश को आत्मनिर्भर बनाने के स्थान पर आश्रित न बना दे । विदेशी कम्पनियों के बाजार में बढ़ते हुए प्रभुत्त्व के विषय में देश की सरकार को ध्यान देने की आवश्यकता है । भारतीय बाजार पर पहले से ही चीन और विदेशी कम्पनियों के द्वारा  निर्मित उत्पाद का कब्ज़ा देखने को मिलता है । देश की जनता का विदेशी वस्तुओं के प्रति लगाव किस प्रकार कम किया जाये तथा भारतीय उत्पाद को विश्व मानक के अनुरूप किस प्रकार विकसित किया जाये, इस पर हम सभी को चिंता करनी होगी ।

हमारे देश में स्वदेशी जागरूकता के नाम पर विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार का चलन है जो उचित नहीं है । हम भारतीय हैं हम सकरात्मक सोच वाले लोग हैं । हमें विदेशी और खासकर चीन के माल का विरोध नहीं करना चाहिए अपितु हमें चीन से प्रेरणा लेकर अपने अनुभव के प्रयोग से वस्तुओं का निर्माण करना चाहिए । हमें यह एहसास करना होगा कि यदि चीन इतने कम मूल्य पर वस्तु का निर्माण कर सकता है तो हम भी कर सकते हैं । हमें और अधिक गुणवत्ता पूर्ण वस्तु बनानी होगी और यदि हम उस पर गारंटी की सुविधा भी प्रदान कर देंगें तो सोने पर सुहागा हो जाएगा । एक मानवीय प्रवर्ती है कि मनुष्य को कम से कम मूल्य पर अधिक से अधिक मूल्यवान और उपयोगी वस्तु प्राप्त करने की लालसा रहती है । आप उसे ऐसा करने से रोकते हैं तो आप उसके अधिकारों का हनन कर रहे हैं । आप उस व्यक्ति को राष्ट्र प्रेम का पाठ नहीं पढ़ा सकते क्योंकि उसकी अध गगरी आय उसको ऐसा करने के लिए सदैव प्रेरित करती रहेगी । फिर भी आप उस पर दबाव बनाने का प्रयास करेंगें तो विरोध स्वाभाविक है । इससे बचने का एक ही मार्ग है हमें उसे कम से कम मूल्य पर अधिक से अधिक मूल्यवान और उपयोगी वस्तु उपलब्ध करानी होगी ।  तभी वह आपके माल को खरीदेगा । आप नकली और ख़राब माल बेचकर  ग्राहक को मूर्ख बना कर तत्काल तो आय का अर्जन कर सकते हैं परन्तु अधिक समय तक मूर्ख नहीं बना सकते । दीर्घकाल में आपको ऐसा उत्पादन करना ही होगा जो स्वत: ही बिके । हमें वस्तु की गुणवत्ता पर ध्यान केन्द्रित करना होगा साथ ही कम से कम मूल्य पर इसे संभव बनाने के प्रयास करने होंगें ।

भारत देश में 133 करोंड़ से अधिक की बौद्धिक तथा श्रम संपदा है जिसके कौशल से सम्पूर्ण विश्व प्रभावित है । इसका प्रयोग करके न हम सिर्फ वस्तुओं का उत्पादन कर सकते हैं अपितु उत्पादन की ऐसी सुनामी खड़ी कर सकते हैं जिसकी लहरों में विश्व के समस्त देशों का उत्पादन और बाजार बह जाएगा । इसके लिए देश की जनता को स्वयं अपनी जिम्मेदारी का एहसास करना होगा । हमें विश्व मानकों को ध्यान में रखते हुए विश्व की श्रेष्टतम  वस्तुओं का उत्पादन करना होगा । सेवा के क्षेत्र में भी हमें आत्मनिर्भर बनने के लिए सर्वोत्तम सेवा को प्राथमिकता देनी होगी । जो गुण तथा मूल्य में भी सभी से बेहतर और उपयुक्त हो ।

 

-प्रशान्त मिश्र

गौतमबुद्ध नगर, उत्तर प्रदेश

सम्पर्क सूत्र-7599022333


Wednesday, August 17, 2022

लेख- सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः, डॉ. प्रशान्त कुमार मिश्र

 सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः


            हमारी संस्कृति ने सदैव दूसरों के लिए जीना सिखाया है। हमारी यही भावना हमें विश्व में निवास करने वाली की सभी अन्य जीवन-शैलियों से अलग और महान बनाती है। अपने हितों की चिन्ता किये बिना जनमानस के कल्याण के लिए अपने जीवन को समर्पित कर देने का नाम ही भारतीय जीवन शैली है। यह हमें सिखाती है स्वयं भूखे रहकर दूसरों का पेट भरना, स्वयं कष्ट सहकर दूसरों की सेवा करना। सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भाग्भवेत, अर्थात् सभी सुखी हों, सभी निरोगी रहें , सभी मंगल घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े। यही हमारे जीवन का मूल मन्त्र है।  इस संस्कृति ने मनुष्यों में अपने निज स्वार्थ से अधिक विश्व कल्याण की भावना के लिए अपना सब कुछ समर्पण कर देने का भाव उत्पन्न किया है।  भारतीयों ने मन में बसे इसी भाव से अपना सब कुछ त्याग करके भी सम्पूर्ण जग को जीत लिया है और सदैव के लिए अमर हो गए। इसी गौरवशाली परम्परा को वर्तमान वंशजों को आगे लेकर चलना चाहिए और उसका अनुसरण करना चाहिए। 

            भारत देश के स्वर्णिम इतिहास में अनेकों दानवीरों ने जन्म लिया है। जो न सिर्फ भारत वर्ष के अपितु विश्व के लिए भी प्रेरणा का स्त्रोत बने। जिन्होंने आवश्यकता पड़ने अपने धन के साथ-साथ अपने जीवन का दान करने में भी कभी संकोच नहीं किया। इसी परम्परा में एक महान वैदिक ऋषि हुए है जिन्हें हम दधीची के नाम से जानते हैं। प्रचलित कथा के अनुसार जब इन्द्रलोक पर वृत्रासुर नामक राक्षस ने अपना अधिकार कर लिया और समस्त देवताओं को देवलोक से निकाल दिया। तब सभी देवता मिलकर ब्रह्मा, विष्णु, महेश के पास गए और अपनी व्यथा सुनाई जिसके उपरान्त ब्रह्मा जी ने उन्हें इस समस्या का उपाय बताते हुए कहा कि पृथ्वी लोक पर दधीची नाम के एक महर्षि रहते हैं। यदि वह अपनी अस्थियाँ दान कर दें तो उनकी अस्थियों से जो वज्र बनेगा उससे वृत्रासुर मारा जा सकता है। वृत्रासुर को यह वरदान प्राप्त था कि वह किसी भी अस्त्र- शास्त्र से नहीं मारा जा सकता है। इसके बाद इन्द्र ने दधीची की शरण में जा कर उनसे अपनी पीड़ा सुनाई तथा अस्थियों का दान माँगा। महर्षि दधीची ने बिना किसी हिचकिचाहट लोक कल्याण के लिए अपनी अस्थियों को दान देना स्वीकार कर लिया और समाधी लगाकर अपना देह त्याग दिया।

        दान वीरों में एक दूसरा नाम आता है जो अपने त्याग और समर्पण के कारण अमर हो गए।  दानवीर कर्ण जिनका जिक्र किये बिना विषय को पूर्ण नहीं किया जा सकता। महाभारत से जुड़ी हुई एक कहानी है सूर्य पुत्र कर्ण की। युद्ध के समय सभी को यह ज्ञात था कि कर्ण को कवच और कुण्डल वरदान स्वरुप प्राप्त हुए हैं और जब तक उनके पास कवच और कुण्डल हैं तब तक उन्हें कोई भी हरा नहीं सकता है। युद्ध में एक भिक्षुक के द्वारा योजनाबद्ध रूप से कवच और कुण्डल दान स्वरुप मांगने पर कर्ण ने अपने जीवन की चिन्ता किए बिना कवच और कुण्डल दान कर दिए। कर्ण की दानशीलता को देख वह प्रसन्न हुए और कर्ण से कुछ मांगने के लिए कहते हैं। लेकिन कर्ण "दान देने के पश्चात् कुछ माँग लेना यह दान की गरिमा के विरुद्ध है" ऐसा कहकर मुस्कुरा बात टाल जाते हैं।   

        सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र चन्द्र के विषय में कौन नहीं जानता जिन्होंने अपने कहे को निभाने के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया।  इन्होंने अपने दानी स्वाभाव के कारण महर्षि विश्वामित्र को अपना सम्पूर्ण राज्य दान कर दिया फिर भी दक्षिणा की पूर्ति न होने के कारण अपनी पत्नी, पुत्र और स्वयं को बेच कर शमशान के डोम के यहाँ नौकरी करने लगे। इस प्रकार का उदाहरण शायद ही विश्व के इतिहास में कहीं और देखने को मिले।

        त्याग और समर्पण की भावना ही हमारी पूंजी है जिसने इतनी भाषाएँ, रिवाज, प्रान्त होने के बाद भी सम्पूर्ण भारत वर्ष को एक साथ जोड़ कर रखा हुआ है। जब मर्यादा पुरुषोत्तम राम को पिता के वचन स्वरुप अयोध्या की राजगद्दी को छोड़कर 14 वर्षों के लिए वन जाने का आदेश प्राप्त हुआ तब उन्होंने बिना किसी संकोच के वनों में जाकर निवास करना स्वीकार कर लिया। वहीं  दूसरी ओर भरत ने अपने बड़ें भाई के आदेश का पालन करते हुए अयोध्या का राज-काज तो संभाला परन्तु बड़े भाई की चरण पादुका को सिंघासन पर रखकर उतने ही समय सन्यासियों जैसा जीवन व्यतीत किया।   

        भारत देश ऐसे अनेकों दानवीरों  की कहानियों और किस्सों से भरा हुआ है जो आज भी हम सभी के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बने हुए हैं । जिन्होंने समय समय पर आवश्यकता पड़ने पर बिना किसी संकोच के अपना सब कुछ दान कर दिया त्याग कर दिया। कभी भी किसी प्रतिफल की चिंता नहीं की। वास्तव में दान का महत्त्व भी तभी है जब वह बिना किसी हित व स्वार्थ की भावना के साथ किया जाए। वर्तमान समय में जब लोग अपने निज स्वार्थ के लिए छोटी-छोटी बातों  पर लड़ रहे है इस समय भी भारत देश की संस्कृति से प्रेरित अनेक दानवीर अपने कर्म का निर्वाह कर रहे हैं।  आवश्यकता पड़ने पर बिना किसी स्वार्थ के रक्त, नेत्र का दान तो किया जा रहा है। लेकिन अभी हाल ही में जब सम्पूर्ण विश्व कोरोना के संक्रमण से ग्रस्त था और वैज्ञानिकों को वैक्सीन के परीक्षण हेतु शरीर की आवश्यकता पड़ी तब देश के कोने-कोने से अनेक लोगों ने अपने जीवन की परवाह किये बिना परिक्षण हेतु अपना शरीर देने की पहल की। यही हमारी परम्परा और संस्कृति का परिणाम है कि आज भी विश्व कल्याण की भावना हमारे लिए सर्वोपरि है ।  

 

-डॉ. प्रशान्त कुमार मिश्र

(लेखक सामाजिक चिन्तक और विचारक हैं )

गौतमबुद्ध नगर, उत्तर प्रदेश

         
   

Tuesday, June 14, 2022

वैचारिक मतभेदों से मनभेद नहीं होना चाहिए

 

वैचारिक मतभेदों से मनभेद नहीं होना चाहिए

 


छोटी-छोटी बातों पर लड़ना और आपस में मनों की दुरी बना लेना। यह कार्य हम सभी को सार्वजानिक जीवन में आगे बढ़ाने के स्थान पर समाज से दुरी बनाने की ओर अग्रसित करता है। एक कुशल नेतृत्वकर्ता होने के लिए आपको इस विषय को न सिर्फ जानना अपितु समझना भी अत्यंत आवश्यक है। सामान्य जीवन में जब कभी हम देखते हैं कि कहीं किसी भी स्थान पर किसी भी विषय को लेकर चर्चा चल रही है तब हम अपनी बुद्धि का परिचय देने के उद्देश्य से भाव वश उक्त चर्चा में स्वयं कूद जाते हैं। धीरे-धीरे चर्चा, चर्चा के स्थान पर बहस बन जाती है और हम उत्तेजित होकर प्रतिद्वंदी। फिर भीषण संग्राम का भी शंखनाद हो जाता है। परिणाम स्वरुप उस स्थान पर जितने भी विपक्ष के पक्षकार थे वह आक्रोशित होकर मनभेद के द्वार पर चले जाते हैं। ऐसी स्थिति में कुशल नेतृत्वकर्ता सभी विषय को गम्भीरतापूर्वक सुनता है समझता है और यदि अत्यंत आवश्यक होता है उस दशा में तर्कों के आधार पर अपना निर्णय देता है। जब आवश्यक न हों तो शान्ति पूर्ण रूप से विषय की अति महत्त्वपूर्ण जानकारी एकत्र करके अपने ज्ञान के कोष में वृद्धि करता है।

यहाँ दोनों शब्दों का अर्थ पूर्ण रूप से समझना भी आवश्यक हो जाता है। वैचारिक मतभेद का अर्थ होता है कि किसी भी विषय पर तर्कपूर्ण विचार प्रस्तुत करना उस पर अपनी स्वीकृति व अस्वीकृति देना। यह मतभेद मात्र विषय को लेकर होता है इसका व्यक्ति के निज जीवन में कहीं स्थान नहीं होता। इस प्रकार के मतभेद शिक्षा जगत में, राजनैतिक जगत में प्रत्यक्ष रूप से देखने को मिलते हैं। राजनैतिक क्षेत्र में खासकर हम यह देखते हैं कि शब्दों के युद्ध में ये परस्पर इतने उत्तेजित और आक्रामक हो जाते है कि गंदे शब्दों की पराकाष्ठा हो जाती है। लेकिन कुछ समय के पश्चात् वह सभी जो शब्दों के युद्ध में एक दुसरे मारने के लिए तैयार थे, साथ बैठकर चर्चा करते हैं चाय एवं आहार का सेवन करते हैं।

वहीं दूसरी ओर जब हम मनभेद की बात करते हैं तब यह देखने को मिलेगा कि मनभेद का मुख्य आधार वैचारिक मतभेद की शुरुवात थी जो एक समय के  बाद अपना मार्ग परिवर्तित करके मनभेद के मार्ग पर चलने लग जाती है। आपस में वैचारिक और सामाजिक दुरी का बनना ही मन भेद का परिणाम है। कभी-कभी यह स्थिति इतनी विकराल भी हो जाती है कि दुरी झगड़े और लड़ाई का रूप धारण करके सम्पूर्ण जीवन भर के लिए बन जाती है। हमें चिंता करनी होगी कि जीवन में कभी ऐसी स्थिति उत्पन्न न होने पाए। राइ का पहाड़ बनते देर नहीं लगती।

मस्तिष्क यह कहता है कि वैचारिक मतभेद के उपरान्त यदि मनुष्यों के ह्रदय में मन भेद का भाव उत्पन्न हो गया हो तो उन्हें आपसी समझ और दिमाग के शांत होने के पश्चात् सब कुछ भुला कर पुनः वैचारिक मतभेद की स्थिति में ही आ जाना चाहिए लेकिन अधिकांश यह देखने को मिलता है कि मन भेद का दायरा इतना अधिक विशाल हो चूका होता है कि अब उसमें बनी दुरी को सरलता से दूर नहीं किया जा सकता है। वास्तव में जब हम किसी विचार के रण को अपनी निज प्रतिष्ठा का प्रश्न बना देते हैं तो हमारे भीतर स्थित अहंकार का भाव हमें सही विषय का ज्ञान होते हुए भी हार स्वीकार करने से रोक देता है। यह वैचारिक मतभेद जीत-हार का विषय नहीं होती, अपितु यह मात्र ज्ञान का आदान-प्रदान कर अपनी समझ की धार को अधिक प्रबल करने का साधन होती है। इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना देना शायद ही किसी बुद्धिजीवी को शोभा देता हो। सही अर्थों में यदि वह बुद्धिजीवी है तो विचारों के द्वंद में वह मन को कभी भी नहीं आने देगा। यदि कभी दुर्भाग्य वश ऐसी स्थिति उत्पन्न होती भी है तो वह क्षणिक ही होती है।      

वर्तमान समय में जब आपसी विचारों के आदान-प्रदान का तंत्र अत्यधिक मजबूत हो गया है इस स्थिति में हमें अपने मन और मस्तिष्क पर विशेष रूप से नियंत्रण करने की आवश्यकता है। इंटरनेट, टेलीविजन, सोशल मिडिया आपके विचार को पल भर में कहाँ से कहाँ पहुँचा सकती है इसका शायद ही उपभोक्ता अंदाजा लगाते हों और इसके परिणाम क्या और कितने व्यापक होते होंगें इसकी यदि हम विचार रखने से पहले कल्पना भी कर लें तो हम विभिन्न प्रकार की विपदाओं से न सिर्फ स्वयं को बचाने में सक्षम होंगें अपितु समाज को भी होने वाली पीड़ा से बचा सकेंगें। अधिकांश यह देखने को मिलता है कि हम इंटरनेट और खासकर की सोशल मिडिया पर चल रहे व्यापक वैचारिक युद्ध में बिना विषय और उसकी  गंभीरता को समझे अपने ही कूद पड़ते हैं। अपने मन की तात्कालिक शांति और मानसिक मल का त्याग कर हम स्वयं को खुश और मानसिक रूप से तो हल्का महसूस करने लगते हैं लेकिन आपके मानसिक मल के त्याग से जो दुर्गन्ध समाज में फ़ैल गई उससे कितने लोग दूषित होंगें इसे जानने और समझने का कभी भी प्रयास नहीं करते हैं।

इसी प्रकार से समाचार चैनलों में आजकल व्यापक रूप से वैचारिक रण के कार्यक्रम प्रसारित किये जा रहे हैं जिनमें विभिन्न विचारों के लोग आ कर अपने-अपने विचार को साझा करते हैं। कई बार यह वैचारिक  मतभेद, मनभेद का रूप धारण कर प्रतिष्ठा का प्रश्न बन कर अपशब्दों, अनुचित टिका टिप्पणी का प्रयोग करने लगता है। समझने योग्य बात यह है कि कार्यक्रम तो अपनी समय सीमा को समाप्त कर विश्राम ले लेता है लेकिन उस प्रसारण के श्रोता उस रण को अपने सामाजिक जीवन में उतार का अनवरत चलाते रहते हैं और प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से असंख्य श्रोता भी उस रण में कूद पड़ते हैं।

देश और दुनिया में निवास करने वाले असंख्य लोगों में किन्हीं दो की भी काया, रूप, रंग, बनावट पूर्ण रूप से एक जैसी नहीं होती है तो सभी व्यक्ति के विचार भी एक जैसे नहीं हो सकते हैं। हमें जो वस्तु पसन्द हो यह जरुरी नहीं कि वह सभी को पसंद हो। जो  हमारे लिए हितकर है जरुरी नहीं की वह किसी दुसरे व्यक्ति के लिए भी हितकर हो। इसी प्रकार हमारे विचार हमारे जीवन के अनुभव और अतीत में घटित घटनाओं के परिणाम होते हैं सभी का जीवन अलग है पर उनके जीवन जीने की परिस्थिति भी अलग-अलग रही है तो यह भी स्वाभाविक है कि उनके विचार भी अलग-अलग ही होंगें। इस विषय को समझ कर ही हमें वैचारिक युद्ध में उतरना चाहिए साथ ही विचारों और ज्ञान के युद्ध को प्रतिष्ठा का मापक नहीं बनाना चाहिए। यदि हम ऐसा करते हैं तो मनभेद की स्थिति उत्पन्न होगी और यह स्थिति किसी भी व्यक्ति और समाज के लिए हितकर नहीं हो सकती।  

    

- प्रशान्त मिश्र

(लेखक सामाजिक चिन्तक और विचारक हैं)

ग्रेटर नोएडा वेस्ट,उत्तर प्रदेश 

 सम्पर्क सूत्र- 7599022333

Wednesday, June 24, 2020

कोरोना काल में डिजिटल होता भारत

कोरोना काल में डिजिटल होता भारत

आवश्यकता ही अविष्कार की जननी है, जिसका सीधा अर्थ होता है कि जब आपको किसी वस्तु की अत्यधिक आवश्यकता होती है तब आप उसका अविष्कार करते हैं। कहने को यह मात्र एक हिन्दी भाषा की कहावत है लेकिन कोरोना संक्रमण काल ने इसे चरितार्थ किया है भारत देश में कोरोना के पहले संक्रमण की पुष्टि 30 जनवरी 2020 को हुई। देश में संक्रमण के प्रभाव को देख और मामले की गंभीरता को समझते हुए 22 मार्च को जनता कर्फ्यू और 24 मार्च को समस्त देश को लॉकडाउन करने का निश्चय किया गया। देश रुक गया यह ठीक उसी प्रकार था जब आप अपनी गाड़ी को बहुत तेज गति से चला रहे हों और अचानक आपके सामने कोई आ जाये। ब्रेक मारने पर शरीर को झटका तो लगता ही है साथ ही हम मन-मस्तिष्क से सोच में पड़ जाते हैं आखिर ये हुआ क्या ? ठीक यही दशा देश के समक्ष उस समय खड़ी हो गई जब अति आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं को छोड़ समस्त उद्योगों का चक्का जाम हो गया, उत्पादन बंद करना पड़ा और सेवाओं की आपूर्ति भी रोक दी गई। यह देश के इतिहास में पहला समय था जब सम्पूर्ण देश इस चिंता में था कि अब क्या होगा ? एक ओर जीवन को बचाने का संकट तो दूसरी ओर जीवन की गाड़ी में ईंधन का कार्य करने वाले "धन" अर्जन का संकट। यह तो ज्ञात था कि यह स्थिति लम्बे समय तक रहने वाली है लेकिन कब तक जवाब किसी के पास नहीं।

हम भारत के लोग हैं हम डरकर, थककर  हार मानने वाले लोग नहीं है न ही किसी भय से घर में शांत बैठने वाले लोग। हमारे पास हर समस्या का समाधान है और लक्ष्य को प्राप्त करने की प्रबल क्षमता। जब लॉकडाउन के कारण बच्चों को विद्यालय जाने से रोक दिया गया तब ऑनलाइन क्लास के माध्यम से शिक्षकों ने घर-घर जाकर शिक्षा देना प्रारम्भ कर दिया। सेमिनार के आयोजन का स्थान वेबिनर ने ले लिया जिसका प्रभाव यह रहा कि धन के अभाव में दूर स्थान पर जाकर गोष्ठियों में प्रतिभागिता तथा विशेषज्ञों के साथ प्रत्यक्ष संवाद न होने की जो बाधा थी वह न सिर्फ दूर हुई अपितु छोटे आयोजनों में भी अन्तराष्ट्रीय ज्ञान का प्रकाश फैलने लगा है। डिजिटल शिक्षा का जो बीज अभी अंकुरित हो रहा था वह अचानक से वट वृक्ष का आकार लेने लगा है। देश के अधिकांश शिक्षकों ने समय की मांग को समझते हुए न सिर्फ स्वयं को डिजिटल माध्यम से जोड़ा साथ ही अपने विद्यार्थियों के लिए भी शिक्षा का व्यापक भण्डार तैयार करना शुरू किया है। जिसका प्रयोग वह अपनी सुविधानुसार कभी भी कहीं भी कर सकता है।

भारत देश में इंटरनेट सेवाओं का प्रारम्भ 15 अगस्त 1995 को विदेश संचार निगम लिमिटेड द्वारा किया गया तथा नवम्बर 1998 को सरकार के द्वारा इंटरनेट सेवा क्षेत्र निजी ऑपरेटरों के लिए खोल दिया गया। इन्टरनेट क्रांति को सबसे ज्यादा बल तब मिला जब 1 जुलाई 2015 को भारत देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी सबसे महत्त्वाकांक्षी योजना "मिशन डिजिटल इंडिया" को लॉन्च किया जिसके अंतर्गत सरकार ने देश के 2.5 लाख गाँव को ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी से जोड़ना का कार्य आरम्भ किया साथ ही भारत नेट, डिजिटल लॉकर, ई. शिक्षा, ई. स्वास्थ्य, ई.साइन, ई. शॉपिंग, की सुविधा को बेहतर बनाने की दिशा में संकल्प लिया। लेकिन मनुष्य तो मनुष्य है वह शीघ्र ही परिवर्तन के लिए तैयार नहीं होता न ही अपने तौर तरीकों को बदलने के लिए। शायद इसी कारण मिशन डिजिटल इण्डिया अपनी गति से मार्ग बनाते हुए अपने लक्ष्यों की ओर धीरे-धीरे बढ़ रहा था और हो सकता था कि उस लक्ष्य को प्राप्त करने में अभी कई वर्ष और लगते। परन्तु होता वही है जी समय को मंजूर होता है, अचानक न सिर्फ भारत देश अपितु समस्त विश्व कोरोना संक्रमण से प्रभावित हो गया और लॉक डाउन की स्थिति उत्पन्न हो गई जिसके परिणाम स्वरुप डिजिटल इण्डिया की गाड़ी जो धीरे-धीरे चल रही थी उसने रफ़्तार पकड़ ली और दौड़ने लगी।

वर्तमान समय में सभी इसके महत्त्व को स्वीकार कर इस ओर कदम बढ़ा रहे हैं। सरकारी और निजी संस्थानों ने वर्क फ्रॉम होम का माहौल बनाना शुरू किया है।  देश की सरकार ने भी सरकारी बैठकों के आयोजनों के लिए भी वीडियो कांफ्रेंसिंग का मार्ग को प्राथमिकता दी है। देश के प्रधानमंत्री स्वयं राज्यों के मुख्यमंत्रियों और कैबिनेट के मंत्रियों के साथ इसी माध्यम से बैठक कर रहे हैं। विदेशों के राष्ट्र अध्यक्षों के साथ भी अब वीडियों कांफ्रेंसिंग के जरिए बात की जा रही है। जनता भी समान की खरीद के समय ऑनलाइन खरीद व भुगतान पर जोर दे रही है । राजनैतिक दल भी इसमें पीछे नहीं है। जहाँ एक ओर बीजेपी ने वर्चुअल रैली के माध्यम से देश में चुनावी रैलियों के स्वरुप को डिजिटल किया है। वहीं अब सारे राजनैतिक दल वीडियों कांफ्रेंसिंग के माध्यम से अपने बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं के साथ घर बैठे प्रत्यक्ष संवाद कर रहे  हैं। ग्राम स्तर से लेकर अन्तराष्ट्रीय स्तर की सभी बैठकें घर बैठे ही आयोजित की जा रही हैं। जनता को लुभाने का कार्य भी अब डिजिटल माध्यम से किया जा रहा है।

भारत देश में कोरोना संक्रमण के मामले दिन प्रतिदिन बढ़ रहे हैं। कोरोना वायरस के कुल संक्रमित मामलों के लिहाज से भारत अब पांचवें स्थान पर पहुँच गया है देश में 3 लाख से अधिक केस सामने आ चुके हैं और पूर्व के आंकड़ों का आंकलन करें तो यह संख्या जून के समाप्त होते होते 5 लाख पहुँचने का अनुमान है । संक्रमण का प्रभाव अभी कई महीने रह सकता है तब तक मिशन डिजिटल इण्डिया से जो क्षेत्र छुट रहे है वह भी इस दिशा में बढ़ चलेंगें। 

         - प्रशान्त मिश्र

जिला-गौतमबुद्ध नगर, उत्तर प्रदेश

Sunday, May 10, 2020

Article




श्री गंगानगर, राजस्थान से प्रकाशित समाचार पत्र "दैनिक स्वर्ण आभा" में मेरा लेख प्रकाशित हुआ, मेरे लेख को अपने समाचार पत्र में स्थान देने के लिए सम्पादक महोदय का ह्रदय से आभार



            मित्रों ! सरकार अधिक समय तक हमें घरों में नहीं रख सकती, देश को अधिक समय तक बंद नहीं रखा जा सकता | सरकार लॉक डाउन के चौथे चरण में आपको घर से बाहर निकलने की छुट दे सकती है | कोरोना संक्रमण की वर्तमान स्थिति को देखकर इसके भविष्य में फैलने का अनुमान लगाया जा सकता है | हमारा जीवन और सुरक्षा हमारे ही हाथों में है |
घर में रहिए, सुरक्षित रहिए

















Friday, April 10, 2020

गाँव से बढ़ती दुरी (Increasing Distance from the Village)

गाँव से बढ़ती दुरी 



           
                मेरा गाँजाना और वहाँ से लौट आना कहींकहीं मन में एक कड़ी के टूटने का एहसास कराता है मानो मुझसे कुछ छूटता जा रहा है कुछ ऐसा जिसके छुट जाने से मेरी जीवन के कैनवास पर रंग तो होंगे पर वो मात्र रंग होंगें, जो दूर से देखने में तो सुन्दर प्रतीत होते हैं पर उनकी चमक कहीं खो सी गई होती है वो पेंटिंग को रंगीन तो कर सकते हैं परन्तु उसमें सुगन्ध और प्राण नहीं फूंक सकते मनुष्य का जीवन एक तालाब में तैरती हुई मछली के समान होता जा रहा है जिसको शीशे के एक सुन्दर से जार में रख दिया है देखने को तो, वो मछली बहुत ही भाग्यशाली है जो तालाब की मिट्टी और पानी से निकलकर एक बड़े आलिशान और रंगीन दुनिया मेंजाती है जहाँ चमक है, भोजन है, साफ निर्मल जल है, देखभाल करने के लिए, लोग लगे हुए हैं  बिना कष्ट के उसे खाने के लिए खाना मिल रहा है  परन्तु वो मछली शायद इस बात से अनजान है कि वो कहींकहीं खुद की स्वतंत्रता को छोड़ किसी और पर आश्रित हो गई है अब उसके पास तैरने के लिए एक बड़ा तालाब नहीं हैही परिवार के साथ जीवन जीने का अनुपम आनंद, उसकी दुनिया कहींकहीं उस शीशे की दुनिया में ही कैद हो गई जो उसने चाहते याचाहते हुए अपनों से दूर बना ली है जिसमें वो खुद को खुश दिखा रही है

            वर्तमान परिदृश्य में देखा जाये तो ठीक यही इस समय स्थिति मानव ने अपनी बना ली है रोजगार की तलाश में वो खुद को शहर की बड़ी-बड़ी इमारतों और चमक की ओर धकेलता ही जा रहा है और उसे खुद अपनी तरक्की कह रहा है आधुनिकीकरण और परिवर्तन जीवन का नियम है, परन्तु इस नियम के नाम पर स्वयं के अधिकारों का हनन और जीवन की खुशियों का खनन कर लेना ये कौन सी बुद्धिमता है भारत देश में शहरीकरण आजादी के बाद से बहुत तीर्वता के साथ बढ़ा है और खुद को संस्कारी कहने के नाम पर बिना जाने समझे पाश्चात्य शैली के अनुसरण की जो पद्धति विकसित होती जा रही है ये युवा पीढ़ी कोसिर्फ अपने कुटुम्ब से दूर करती जा रही है अपितु स्वावलम्बन के स्थान पर दासता प्रथा की ओर भी अग्रसित कर रही है और पूछने पर गाँव में शिक्षा और रोजगार का अभाव बता कर दोषारोपण करते हैं फिर मन में एक प्रश्न उत्त्पन होता है कि देश में शहरीकरण और उद्योगो का चलन गत ७० वर्षों में बहुत तीर्वता के साथ बढ़ा है तो क्या स्रष्टि के प्रारंभ से लेकर कई हजारों सालों में जब आज जैसे आधुनिक शहर नहीं थे तो क्या गाँव में शिक्षा व्यवस्था नहीं थी, क्या गाँव में रोजगार नहीं थे?

          क्या जो भूमि कई हजारों सालों से आपका भरण-पोषण कर रही थी वो भूमि अब आपको दो वक्त की रोटी देने में भी असमर्थ है आखिर ऐसा क्यों ?

          इसके दो कारण हो सकते हैं पहला तो ये की वास्तव में समस्या है या दूसरा ४०० वर्ष अंग्रजों की गुलामी के बाद भी आज हम खुद को मानसिक रूप से गुलामी से बाहर निकाल पाने में असमर्थ हैं हम स्वयं को उस रूप में अधिक उत्तम समझने की कोशिश करने में लगे हैं जैसे अंग्रेज थे क्योंकि उस चकाचौंध ने हमको बहुत अधिक प्रभावित किया
 
            आज जिस गति से गाँव से पलायन होता जा रहा है और पारंपरिक कार्यों को तुच्छ समझ कर, हम उससे दुरी बनाते जा रहे हैं हम अपने त्योहारों की रंगत और चमक को शहर की संकुचित जीवन शैली में तिलांजलि देते जा रहे हैं त्योहारों और रीती-रिवाजों के उत्सव को अपनी सुविधा के अनुसार परिवर्तित करते जा रहे हैं यह कहाँ तक उचित है ?  ये कहींकहीं यह उस समय अधिक कष्टदायी होगा जब हम अपनी संस्कृति का हस्तांतरण आने वाली पीढ़ी को कर रहे होंगें भविष्य में हमें अपनी पीढ़ियों को सुनाने के लिए अपने गाँव और रीती-रिवाजों की कहानी मात्र ही शेष रह जाएगी, दिखाने के लिए अपने दादा-दादी और नाना-नानी का गाँव और उनके द्वारा दिए गए संस्कार नहीं उस समय हमारी भविष्य की पीढ़ी हम से सवाल करेगी कि "आपने गाँव क्यों छोड़ा - क्या हमारा भी कोई गाँव था ? हमारे गाँव की परम्परा क्या थी, हमारे यह त्यौहार कैसे मनाये जाते थे ? तब हमारे हाथों को सिकोड़ने के अतिरिक्त हमारे पास कोई जवाब नहीं होगा कहीं यह शहरीकरण की अंधी दौड़ में भविष्य के गाँव और पूर्व के हजारों साल की पूर्वजों के प्रति हमारा किया गया छल तो नहीं जिन्होंने सदियों से अपने रीती-रिवाजों और संस्कारों को बचाये रखा  या यह एक धोखा हो सकता है जो हम अपनी संस्कृति के साथ कर रहे हैं अपनी सभ्यता के साथ कर रहे हैं ?

           समस्या से भागना समस्या का समाधान नहीं है, यह आपको तत्कालिक प्रभाव तो दिखा सकता है परन्तु जीवन पर्यंत नहीं यदि हमारे गाँव  में किसी प्रकार की समस्या है तो उसका समाधान वैसे ही होना चाहिए जिस प्रकार से समाधान कई सौ वर्षो से होतारहा है गाँव की मिट्टी में आज भी इतनी शक्ति है कि वह कई परिवारों का पेट पाल सकती है कष्ट है तो मात्र आत्म-मनोबल गिरने, स्वयं की शक्ति के आंकलनहोने का, जो शहर की झूठी चकाचौंध के कारण हमें पुनः मजबूत संकल्प के साथ खड़े होने नहीं देती       

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