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पंचायती राज व्यवस्था के बारे में विस्तार से जानने के लिए आप इस वेबपेज का प्रयोग कर सकते हैं, अधिक जानकारी के लिए आप नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में अपने सवाल लिख कर भेजिए-
Sunday, July 12, 2026
Saturday, July 11, 2026
उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत प्रमुख या सदस्य का त्याग-पत्र/ अविश्वास प्रस्ताव/हटाया जाना
उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत प्रमुख या सदस्य का त्याग-पत्र
प्रमुख या सदस्य का त्याग-पत्र (धारा-11)
ब्लॉक प्रमुख या क्षेत्र पंचायत का कोई निर्वाचित सदस्य स्वहस्ताक्षरित पत्र द्वारा पद त्याग सकता है। ब्लॉक प्रमुख सम्बंधित जिला पंचायत के अध्यक्ष को और अन्य (सदस्य) क्षेत्र पंचायत के प्रमुख को त्याग पत्र देते हैं। प्रमुख का त्याग-पत्र उस दिनांक से प्रभावी होगा, जब अध्यक्ष द्वारा त्याग पत्र की स्वीकृति क्षेत्र पंचायत के कार्यालय में प्राप्त हो जाए। सदस्य द्वारा दिया गया त्याग-पत्र उस दिनांक से प्रभावी होगा, जब क्षेत्र पंचायत के कार्यालय में उसकी नोटिस प्राप्त हो जाए। इस प्रकार यह समझा जाएगा कि ऐसे प्रमुख या सदस्य ने अपना पद रिक्त कर दिया है।
प्रमुख का अविश्वास प्रस्ताव / हटाया जाना (धारा-15, 16)
उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत तथा जिला पंचायत अधिनियम, 1961 की धारा-15(1) में यह कहा गया है कि प्रमुख में अविश्वास का प्रस्ताव धारा 15(2) और 15 (3) में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार किया जा सकता है तथा उस पर कार्यवाही की जा सकती है।
1. धारा 15(2) के तहत प्रस्ताव करने का अभिप्राय का निर्धारित प्रारूप पर लिखित नोटिस क्षेत्र पंचायत के तत्कालीन निर्वाचित सदस्यों की कुल संख्या के कम से कम आधे सदस्यों द्वारा हस्ताक्षर किया जाएगा।
2. प्रस्तावक सदस्यों में से किसी एक के द्वारा व्यक्तिगत रूप से अविश्वास प्रस्ताव की प्रति कलेक्टर को दी जाएगी।
3. उसके बाद कलेक्टर क्षेत्र पंचायत की एक बैठक क्षेत्र पंचायत कार्यालय में अपने द्वारा निर्धारित तिथि पर बुलायेंगें और यह तिथि उपधारा 15 (2) के अधीन उसे नोटिस दिए जाने की दिनांक से तीस दिन के बाद की नहीं होगी।
4. कलेक्टर द्वारा क्षेत्र पंचायत के निर्वाचित सदस्यों को ऐसी बैठक के लिए कम से कम 15 दिन का नोटिस निर्धारित रीति से दिया जाएगा।
5. ऐसी बैठक की अध्यक्षता उस परगनाधिकारी (एस.डी.एम.) करेगा, परन्तु प्रतिबन्ध यह है कि यदि क्षेत्र पंचायत एक से अधिक परगनों में क्षेत्राधिकार का प्रयोग करती हो अथवा परगनाधिकारी किसी कारणवश अध्यक्षता न कर सकें, तो कलेक्टर द्वारा नाम निर्दिष्ट कोई वैतनिक अपर या सहायक कलेक्टर उक्त बैठक की अध्यक्षता करेंगें।
6. इस धारा के अधीन बुलाई गई बैठक के प्रारम्भ होते ही पीठासीन अधिकारी क्षेत्र पंचायत को वह प्रस्ताव पढ़कर सुनाएंगें, जिस पर विचार करने के लिए बैठक बुलाई गई हो तथा वह यह घोषित करेंगें कि उस पर वाद-विवाद किया जा सकता है।
7. इस धारा के अधीन किसी प्रस्ताव पर वाद विवाद स्थगित न होगा।
8. यदि ऐसा वाद-विवाद बैठक प्रारम्भ होने के लिए निश्चित समय से दो घन्टे बीतने के पहले ही समाप्त न हो जाए, तो वह दो घन्टे बीतते ही स्वतः ही समाप्त हो जाएगा। वाद-विवाद की समाप्ति पर अथवा दो घन्टे की समाप्ति पर जो भी पहले हो, वह प्रस्ताव गुप्त मतदान के लिए प्रस्तुत किया जाएगा।
9. पीठासीन अधिकारी प्रस्ताव के गुण-दोषों पर नहीं बोलेंगें और न वह उस पर मत देने के अधिकारी होंगें।
10. पीठासीन अधिकारी बैठक के तुरन्त बाद कार्यवाही की एक प्रति और उस पर हुए मतदान का परिणाम राज्य सरकार को तथा क्षेत्राधिकार युक्त जिला पंचायत को देंगें।
11. यदि प्रस्ताव क्षेत्र पंचायत को तत्कालीन सदस्यों की कुल संख्या के कम से कम आधे से अधिक समर्थन से पारित हो; तो
(क) पीठासीन अधिकारी उक्त राय का प्रकाशन क्षेत्र पंचायत कार्यालय के नोटिस बोर्ड पर चिपकवाकर करेंगें तथा गजट में उसे विज्ञापित भी कराएंगें।
(ख) नोटिस बोर्ड पर बैठक के निर्णय को चस्पा करने के अगले दिन ही प्रमुख अपना पद छोड़ देंगें।
12. यदि प्रस्ताव पारित न हुआ हो अथवा यदि गणपूर्ति न होने के कारण बैठक न जो सकी हो, तो जब तक कि उक्त बैठक की दिनांक से एक वर्ष व्यतीत न हो जाए, तब तक उसी प्रमुख में अविश्वास व्यक्त करने वाले किसी अनुवर्ती प्रस्ताव को नोटिस ग्रहण नहीं किया जाएगा।
13. इस धारा के अधीन किसी प्रस्ताव का नोटिस प्रमुख के पद ग्रहण करने के एक वर्ष के भीतर ग्रहण नहीं किया जाएगा।
प्रमुख का हटाया जाना (धारा-16)
1. इन्हें निम्न आधारों पर अधिनियम की धारा-16 के अंतर्गत अपने पद से हटाया भी जा सकता है।
2. यदि राज्य सरकार की राय में प्रमुख अपने कर्तव्यों तथा कृत्यों का पालन जान-बूझ कर नहीं करते या अपने अधिकारों का दुरूपयोग करते हैं अथवा अपने कर्तव्यों के पालन में उन्हें अनाचार का दोषी पाया गया है या मानसिक या शारीरिक रूप से अपने कर्तव्यों के पालन में असमर्थ हो गए हों, तो राज्य सरकार, यथास्थिति उन्हें स्पष्टीकरण का समुचित अवसर देगी। इस मामले में अध्यक्ष का परामर्श मांगने और उसकी राय ऐसे परामर्श मांगने के पत्र के भेजे जाने की दिनांक से 30 दिन के भीतर प्राप्त हो जाए, तो इस राय पर विचारोपरांत, ऐसे प्रमुख को आदेश द्वारा राज्य सरकार पद से हटा सकती है- ऐसा आदेश अंतिम होगा और उस पर किसी विधि न्यायालय में आपत्ति न की जा सकेगी। इस प्रक्रिया में प्रतिबिम्ब यह रखा गया है कि यदि नियत प्राधिकारी द्वारा प्रथम दृष्टया यह पाया जाए कि किसी प्रमुख ने वित्तीय और अन्य अनियमितताएं की है, तो ऐसा प्रमुख, अंतिम जाँच में आरोपों से मुक्त होने तक वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियों और कृत्यों का प्रयोग और संपादन नहीं करेगा। ऐसी स्थिति में इस निमित्त क्षेत्र पंचायत के तीन निर्वाचित सदस्यों की समिति उक्त कार्य करेगी।
3. इस धारा के अधीन पद से हटाया गया प्रमुख अपने पद से हटाये जाने की दिनांक से तीन वर्ष की अवधि तक प्रमुख के रूप में पुनः निर्वाचन का पात्र न होगा।
उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत और उसके सदस्यों का कार्यकाल
उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत और उसके सदस्यों का कार्यकाल
क्षेत्र पंचायत और उसके सदस्यों का कार्यकाल (धारा-8)
* प्रत्येक क्षेत्र पंचायत, यदि इस अधिनियम के अधीन उसे पहले से हो विघटित नहीं कर दिया जाता है तो अपने प्रथम बैठक के लिए नियत दिनांक से पांच वर्ष के अधीन तक, न कि उससे अधिक बनी रहेगी।
* किसी क्षेत्र पंचायत के किसी सदस्य का कार्यकाल, यदि इस अधिनयम के उपबंधों के अधीन अन्यथा समाप्त न कर दिया जाये तो क्षेत्र पंचायत के कार्यकाल के अवसान तक होगा।
कुछ मामलों में अस्थाई व्यवस्था (धारा-9 क)
जब प्रमुख अनुपस्थिति, बीमारी अथवा अन्य किसी कारण से अपने कृत्यों का निर्वहन करने में असमर्थ हो, तब जिस दिनांक तक प्रमुख अपना पदभार फिर से न ग्रहण कर ले, उस दिनांक तक जिला मजिस्ट्रेट आदेश द्वारा प्रमुख के कृत्यों का निर्वहन करने के लिए विवेकानुसार व्यवस्था कर सकता है।
आकस्मिक रिक्तियों की पूर्ति (धारा-12)
यदि किसी प्रमुख या क्षेत्र पंचायत के किसी निर्वाचित सदस्य का स्थान, मृत्यु या अन्य किसी कारण के रिक्त हो जाए, तो उस स्थान की पूर्ति होने की दिनांक से छ: मास की अवधि की सम्पति के पूर्व, पूर्वाधिकारी के शेष कार्यकाल के लिए की जाएगी। यहाँ यह प्रतिबन्ध भी रहेगा कि यदि पद रिक्त होने की दिनांक, क्षेत्र पंचायत के शेष कार्यकाल 6 मास से कम हो, तो रिक्त की पूर्ति नहीं की जाएगी।
सदस्यता या अनर्हता के सम्बन्ध में विवाद (धारा-14)
* यदि यह विवाद उठे कि कोई ग्राम प्रधान क्षेत्र पंचायत का सदस्य है कि नहीं तो यह विवाद राज्य सरकार को नियत रीति से भेजा जाएगा और उस पर राज्य सरकार का निर्णय अंतिम तथा बाध्यकारी होगा।
*यदि इस विषय पर विवाद है कि कोई व्यक्ति क्षेत्र पंचायत का सदस्य विविध: चुना गया अथवा नहीं या वह सदस्य होने के लिए पात्र है कि नहीं तो प्रश्न न्यायाधीश को नियत रीति से भेजा जाएगा एवं उस पर न्यायाधीश का निर्णय अंतिम तथा बाध्यकारी होगा।
*यदि न्यायाधीश यह निर्णय करे कि सदस्य विधित: नहीं चुना गया था या वह क्षेत्र पंचायत का सदस्य रहने का पात्र नहीं रह गया है तो वह तो वह सदस्य उस निर्णय की दिनांक से क्षेत्र पंचायत का सदस्य नहीं रहेगा।
Friday, July 10, 2026
उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत की बैठक
उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत की बैठक
क्षेत्र पंचायत की बैठकें एवं बैठकों की प्रक्रिया (धारा-84 व 85)
क्षेत्र पंचायत की बैठकें उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत एवं जिला पंचायत अधिनियम, 1961 की धारा-84 के अंतर्गत निम्न प्रकार आयोजित की जाती है:-
* संगठन के पश्चात् बैठक एक माह के अन्दर होना आवश्यक है।
* हर 2 महीने में क्षेत्र पंचायत की कम से कम बैठक जरुर होगी ।
* क्षेत्र पंचायत की बैठक को बुलाने का अधिकार प्रमुख को है ।
*यदि क्षेत्र पंचायत के 1/5 सदस्य लिखित रूप से मांग करें (सीधे हाथ से दिया गया हो या प्राप्ति पर सहित रजिस्टर्ड डाक द्वारा दिया गया हो) तो आवेदन प्राप्ति के एक महीने भीतर प्रमुख क्षेत्र पंचायत की बैठक जरुर बुलाएगा।
*कोई बैठक आगे की तिथि के लिए स्थगित की जा सकेगी और इस प्रकार स्थगित बैठक आगे भी स्थगित की जा सकती है।
*प्रत्येक बैठक क्षेत्र पंचायत कार्यालय या किसी अन्य सुविधाजनक स्थान पर, जिसकी सूचना सम्यक रुप से दी जा चुकी होगी।
बैठकों का दिनांक, समय और स्थान:-
* क्षेत्र पंचायत की बैठक धारा 84 क अनुसार बुलाई जा सकती है।
* प्रत्येक बैठक की सूचना, दिनांक, समय एवं स्थान सहित खण्ड विकास अधिकारी द्वारा प्रत्येक सदस्य को उसके अंतिम ज्ञात पते पर, बैठक की दिनांक से कम से कम 10 दिन पूर्व भेजी जाएगी या भिजवाई जाएगी।
*आपातकालीन बैठक के लिए 10 दिन सूचना आवश्यक नहीं है। अर्थात् अल्पकालीन सूचना के आधार पर भी बैठक बुलाई जा सकती है।
* अगर किसी बैठक में अगली बैठक का दिनांक निश्चित कर दिया जाए, तो इसकी सूचना बैठक में उपस्थित सदस्यों को भेजने की आवश्यकता नहीं होगी। परन्तु परिवर्तन होने पर सूचना अवश्य दी जाएगी।
* कोई भी बैठक एक से अधिक तक हो सकती है।
गणपूर्ति/ कोरम :-
* बैठक में गणपूर्ति के लिए एक तिहाई सदस्यों की संख्या अनिवार्य होगी, परन्तु विशेष संकल्प को पारित करने हेतु आधे सदस्यों की उपस्थिति आवश्यक है । यदि कोई बैठक गणपूर्ति न होने के कारण स्थगित कर दी जाएं, तो स्थगित बैठक के लिए गणपूर्ति की आवश्यकता नहीं होगी।
बैठक की अध्यक्षता:-
* बैठक में प्रमुख अनुपस्थित होने पर बैठक की अध्यक्षता करने के लिए उपस्थित सदस्य अपने में से एक सदस्य को अध्यक्षता के लिए चुन लेंगें।
स्त्रोत- क्षेत्र पंचायत सदस्यों के प्रशिक्षण हेतु संदर्भ साहित्य
Thursday, July 9, 2026
उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत हेतु संवैधानिक प्राविधान
उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत हेतु संवैधानिक प्राविधान
क्षेत्र पंचायत प्रमुख के सम्बन्ध में विविध प्राविधान (धारा-7)
प्रत्येक क्षेत्र पंचायत में निर्वाचित सदस्यों द्वारा अपने में से ही एक प्रमुख चुना जाएगा। क्षेत्र पंचायत के निर्वाचित सदस्यों के किसी पद के रिक्त के होते हुए भी प्रमुख के पद के लिए चुनाव किया जा सकेगा ।
शपथ या प्रतिज्ञान:
किसी क्षेत्र पंचायत का प्रमुख प्रथम बार प्रमुख के रूप में अपना पद ग्रहण के पहले परगनाधिकारी या जिला मजिस्ट्रेट द्वारा इस निमित्त किसी अधिकारी के समक्ष शपथ या प्रतिज्ञान लेगा। क्षेत्र पंचायत का सदस्य प्रथम बार सदस्य के रूप में अपना पद ग्रहण करने के पहले प्रमुख या उसकी अनुपस्थिति में खण्ड विकास अधिकारी के समक्ष शपथ लेगा।
क्षेत्र पंचायत प्रमुख के कार्यदायित्व (धारा-81)
उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत तथा जिला पंचायत अधिनियम, 1961 की धारा-81 के अंतर्गत क्षेत्र पंचायत के प्रमुख के कार्यदायित्वों का निर्धारण किया गया है। इसके अनुसार-
* क्षेत्र पंचायत और उसकी समितियां, जो तदर्थ नियुक्त की जाएं, की सभी बैठकें को बुलाएं और उनकी अध्यक्षता करें।
*क्षेत्र पंचायत की सभी बैठकों में कार्य संपादन को तदर्थ बनाए गए किसी विनिमय के अनुसार अन्यथा नियंत्रित करें।
*क्षेत्र पंचायत के वित्तीय प्रशासन पर दृष्टि रखें तथा कार्यपालक प्रशासन का अधीक्षण करें तथा उसमें किसी त्रुटि को क्षेत्र पंचायत की जानकारी में लायें।
*ऐसे अन्य कर्तव्यों का सम्पादन करें, जो इस अधिनियम अथवा तत्समय प्रचलित किसी अन्य विधि की अधीन उससे अपेक्षित हों अथवा आवंटित किये जाएं।
स्त्रोत:- क्षेत्र पंचायत सदस्यों के प्रशिक्षण हेतु सन्दर्भ साहित्य
लेख- अंधकार से प्रकाश का मार्ग है श्रीमद्भागवत महापुराण
अंधकार से प्रकाश का मार्ग है श्रीमद्भागवत महापुराण
जीवन की उलझनों के मकड़जाल में भी शान्त और एकाग्रचित्त रहने हेतु सहयोगी हो सकता है अध्ययन ।
भारत भूमि अनंत काल से ज्ञान की भूमि रही है, वर्तमान में जब कभी यह सुन और कहा जाता है कि भारत विश्व गुरु है अथवा बनेगा तो इसका साधारण शब्दों में भावार्थ सम्पूर्ण विश्व और मानव जाति को दिशा और दशा प्रदान करने की असीम शक्ति के संचार केंद्र के रूप में भारत देश को देखना है । यह ज्ञान एक या दो दिन का पुस्तक अध्ययन नहीं है । यह प्राचीन काल से अपने ह्रदय में ज्ञान का प्रकाश समेटे भारत देश का गौरवशाली इतिहास है ।
भारत के प्राचीन गुरुकुल, ऋषि, मुनियों के ज्ञान से सुसज्जित तक्षशिला विश्वविद्यालय, नालंदा विश्वविद्यालय, विक्रमशिला विश्वविद्यालय, कांचीपुरम, शारदापीठ ऐसे अनेकों ज्ञान के केंद्र भारत देश में ही रहे हैं। जिन्होंने समय-समय न सिर्फ अपना कार्य किया अपितु अपने ज्ञान के कौशल को साबित भी किया। कहते हैं कि ह्वेन सांग जब नालंदा विश्वविद्यालय गया तो उस समय वहाँ लगभग 10,000 से अधिक छात्र एवं 1,510 शिक्षक थे। जिनमें तिब्बत, जापान, कोरिया, सुमात्रा, श्रीलंका सहित विश्व के कई देशों के छात्र वहां अध्ययन कर रहे थे ।
वर्तमान में आधुनिक शिक्षा पद्धति में ज्ञान अर्जन एवं विश्वविद्यालय का स्वरुप अवश्य परिवर्तित हुआ है परन्तु भारतीय शिक्षा अब भी अपने अलौकिक ज्ञान के कारण समृद्ध है ।
भारतीय धार्मिक ग्रन्थ ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद अथर्ववेद, जिन्हें हम वेद कहतें हैं। इनके साथ ही उपनिषद, पुराण, रामायण, श्रीमद्भागवत गीता, मनुस्मृति सबका अपना-अपना महत्त्व है जो सम्पूर्ण मानव जगत को सही जीवन की दिशा प्रदान करते हैं। इन्हीं में से एक है श्रीमद्भागवत महापुराण । जो जीवन की जटिल परिस्थितियों में सही मार्ग का चयन करने की प्रेरणा देता है यह ग्रन्थ केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों को भी मजबूत करता है।
एक उदाहरण के रूप में देखें तो श्रीमद्भागवत महापुराण के तृतीय स्कंध के क्रमश: २८, २९, ३० वें श्लोक में युवा अवस्था और उसके व्यवहार का वर्णन देखने को मिलता है: -
इत्येवं शैशवं भुक्त्वा दुःखं पौगण्डमेव च।
अलब्धाभिप्सितोऽज्ञानादिद्धमन्युः शुचार्पितः ॥ २८॥
सह देहेन मानेन वर्धमानेन मन्युना।
करोति विग्रहं कामी कामिष्वन्ताय चात्मनः ॥ २९॥
भूतैः पञ्चभिरारब्धे देहे देह्यबुधोऽसकृत्।
अहं ममेत्यसद्ग्राहः करोति कुमतिर्मतिम् ॥ ३०॥
जब एक बालक अपनी बाल्य अवस्था से अपनी युवावस्था में पहुँचता है। इस समय यदि उसे कोई इच्छित भोग नहीं प्राप्त होता है, तो अज्ञानतावश उसका क्रोध उत्पन्न होने लगता है और वह शोकाकुल हो जाता है। देह के साथ ही साथ अभिमान और क्रोध बढ़ जाने के कारण वह कामपरवश जीव अपना ही नाश करने के लिए दूसरे कामी पुरुषों के साथ वैर ठानता है। खोटी बुद्धिवाला वह अज्ञानी जीव पंचभूतों से रचे हुए इस देह में मिथ्याभिनिवेश के कारण निरन्तर मैं-मेरेपन का अभिमान करने लगता है।
यह एक व्यवहारिक ज्ञान का उदाहरण है जिनको इसकी जानकारी होती है उनकी समझ का दायरा अधिक होता जाता है और जो आज भी इससे अनभिज्ञ है वह यह व्यवहार क्यों ? और किसलिए? इसका समाधान क्या होगा? इसकी उलझनों में ही उलझे रहते हैं । किस काल परिस्थिति में क्या करना उचित होगा? यह घटना क्यों घटित हो रही है? इसका भाव एवं कारण पूर्व से ही लिखित है। अंतर इतना है जो पढ़ गए वो समझ गए और जिनको जानकारी नहीं है वह चिंतित रहते हैं।
गीताप्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवत महापुराण दो खण्डों में है, प्रथम खण्ड स्कंध 1 से स्कन्ध 8 तक है जिसके प्रारम्भ में श्रीमद्भागवत की पूजन-विधि तथा विनियोग, न्यास एवं ध्यान विधि का वर्णन है तथा द्वितीय खण्ड स्कन्ध 9 से स्कन्ध 12 तक है। यह महापुराण गुजराती, मराठी, बंगला, ओड़िआ, अंग्रेजी, तेलगु, कन्नड़, मलयालम, तमिल भाषा में भी उपलब्ध है।
कहा जाता है कि लोक विख्यात श्रीमद्भागवत नामक पुराण का प्रतिदिन श्रद्धायुक्त होकर श्रवण करना चाहिए यही हमारे संतोष का कारण है। जो मनुष्य प्रतिदिन श्रीमद्भागवत महापुराण का पाठ करता है, उसे एक-एक अक्षर के उच्चारण के साथ कपिला गौ-दान देने का पुण्य प्राप्त होता है।
पंडित मदन मोहन मालवीय लिखते हैं कि "मुझको श्रीमद्भागवत में अत्यंत प्रेम है। मेरा विश्वास और अनुभव है कि इसके पढ़ने और सुनने से मनुष्य को ईश्वर का सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है और उनके चरण कमलों में अचल भक्ति होती है। इसके पढ़ने से मनुष्य को द्रण निश्चय हो जाता है कि इस संसार को रचने और पालन करने वाली कोई सर्वव्यापक शक्ति है”।
एक अनन्त त्रिकाल सच, चेतन शक्ति दिखात।
सिरजन, पालत, हरत, जग, महिमा बरनि न जात।।
इसी एक शक्ति को लोग ईश्वर, ब्रह्म, परमात्मा इत्यादि अनेक नामों से पुकारते हैं। श्रीमद्भागवत के पहले ही श्लोक में वेदव्यास जी ने ईश्वर के स्वरुप का वर्णन किया है कि जिससे इस संसार की सृष्टि, पालन और संहार होते हैं, जो त्रिकाल में सत्य है, अर्थात् जो सदा रहा भी, है भी और रहेगा भी, और जो अपने प्रकाश से अंधकार को सदा दूर रखता है, उस परम सत्य का हम ध्यान करते हैं।
जब तक मनुष्य श्रीमद्भागवत को पढ़े नहीं और उसकी इसमें श्रद्धा न हो, तब तक वह समझ नहीं सकता कि ज्ञान भक्ति वैराग्य का यह कितना विशाल समुद्र है । भागवत के पढ़ने से उसे यह विमल ज्ञान हो जाता है कि एक ही परमात्मा प्राणी-प्राणी में बैठा हुआ है और जब उसको यह ज्ञान हो जाता है, तब उसका अधर्म करने को मन नहीं करता है क्योंकि दूसरों को चोट पहुँचाना और अपने को चोट पहुँचाने के समान हो जाता है। मनुष्य में परस्पर प्रेम और प्राणि मात्र के प्रति दया का भाव स्थापित करने के लिए इससे बढ़कर कोई साधन नहीं है । वर्तमान समय में जब संसार के बहुत अधिक भागों में भयंकर युद्ध छिड़ा हुआ है, मनुष्य मात्र को इस पवित्र धर्म का उपदेश अत्यंत कल्याणकारी होगा ।
यह आवश्यक नहीं है कि आप सनातन जीवन शैली को मानने वाले हों या आप भगवान में विश्वास करते हों, यदि आप पूर्ण रूप से नास्तिक भीं हैं अथवा आप किसी अन्य पूजा पद्धति का पालन करते हैं, तब भी आपको जीवन में परमात्मा और उसके निरंकार अस्तित्व को जानने और समझने के लिए श्रीमद्भागवत महापुराण का पठन एवं पठान करना चाहिए। इस ग्रन्थ को सिर्फ एक धार्मिक चश्मे से देखना एक समझदार और बुद्धिजीवी व्यक्ति के लिए संकीर्ण सोच का प्रमाण हो सकता है। आप इसे एक सामान्य पुस्तक के रूप में पढ़े और बिना किसी प्रकार का पुस्तक के प्रति प्रतिबिम्ब अपने मस्तिष्क में बनायें हुए ।
- प्रशान्त मिश्र
(लेखक सामाजिक चिन्तक और विचारक हैं)
मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश
Wednesday, April 8, 2026
लेख :- प्रकृति का संरक्षण हमारी नैतिक जिम्मेदारी है
प्रकृति
का संरक्षण हमारी नैतिक जिम्मेदारी है
हम
प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाएँ,
दोषारोपण
का कार्य दूसरों पर छोड़ दें।
गर्मी का मौसम आ रहा है, अब सभी को पेड़ों की याद आएगी, और मनुष्य पेड़ काट-काट
कर ऊँची-ऊँची इमारतें खड़ी कर रहा है यह भी महसूस होने लगेगा । जब कड़ी धूप में घर
से बाहर निकलेंगें तो पेड़ों की छाया और ठंडक की आवश्यकता महसूस होगी, कई बार मन में ख्याल भी आएगा कि “मनुष्य कितना स्वार्थी होता जा रहा है कि
उसे पर्यावरण की तनिक भी चिंता नहीं है, न ही उसे पेड़ पौधे
लगाने का कोई विचार आता है”। यदि हमारी भावनाएं और अधिक विकराल होंगी तो हम राज्य
सरकार और केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहरा अपने मन को तसल्ली दे देंगें । फिर मजबूत
संकल्प के साथ विचार करेंगें कि यदि मैं किसी उच्च अथवा सत्ता पक्ष में नेतृत्व की
भूमिका में होता तो आज चारों तरफ हरियाली ही हरियाली होती। यह सोच-सोच कर हमारा मन
हर्ष उल्लास से भर जायेगा और हम अपने घर चलें जायेंगें। अगले दिन फिर हमें किसी
कारण से धूप में निकलना पड़ा तो हम पुनः यही विचारों का एक मकड़जाल बना कर राहत की
साँस लेंगें
संभवतः यह पढ़कर आपको थोड़ा अजीब
लगे परन्तु शहरी क्षेत्रों में अधिकाशं व्यक्तियों का जीवन गर्मियों के मौसम में
इतनी चिंता तक ही सीमित रहता है, जिनका चिंतन थोड़ा अधिक हो
जाता है वह आस-पास की किसी नर्सरी से छोटे से गमले में एक-दो पौधे ले आते हैं और
अपने घरों की छत अथवा बालकनी में रख देते हैं । यदि आप बाकि लोगों से थोड़ा अधिक
सजग और जागरूक हैं तो आस-पास के पार्क में पौधे लगाने और उसका संरक्षण करने का
प्रयास करते हैं। इनसे भी जो अधिक सजग हैं वो सामूहिक रूप से पौधे लगाने का
कार्यक्रम करते हैं और जन-जागरूकता अभियान जैसे आयोजन का प्रयास करते हैं। ठीक है
कुछ नहीं से कुछ तो भला।
यदि आपका मन भी प्रकृति के साथ
जुड़ा हुआ है और आपको पेड़-पौधे, जलीय जीवन की चिंता होती
है तो अभी आपके मन में प्रकृति के प्रति संवेदना है। वास्तव में शहरी क्षेत्रों
में मनुष्य का जीवन आर्थिक गतिविधियों के कुशल संचालन और परिवार के भरण पोषण में
इतना उलझ कर रह गया है कि वह चाहते हुए भी बहुत से कार्य नहीं कर पा रहा है । घरों
का क्षेत्रफल दिन पर दिन छोटा होता जा रहा है, जिन लोगों ने
एकांकी जीवन का चयन करते हुए अथवा सुविधाओं को देखते हुए ऊँची इमारतों में अपना
फ़्लैट ले लिया है उनके यहाँ छतों की जगह छोटी बालकनी ने ले ली है, ऐसे में बड़े गमलों और पौधे लगाने की सम्भावना लगभग न के बराबर हो जाती है,
जो लोग किराये के मकान में हैं वह कभी मकान बदलना होगा तो क्या होगा?
इसकी चिंता में अधिकांश कम और छोटे पौधों को ही महत्त्व देते हैं । जिनके
पास स्वयं की छत भी है वह इस चिंता में उलझ जाते हैं कि पौधों का नियमित भरण पोषण
कैसे होगा ? उसमें खाद कब और कैसे पड़ेगी? इनसे भी बड़ी चिन्ता यह है कि गमलों में गर्मियों के मौसम में सुबह और शाम
दोनों समय पानी डालना पड़ता है, यदि दो दिन भी चूक हुई तो
पौधा सूखने लगेगा ।
जब से ऑनलाइन शॉपिंग का चलन बढ़ा है तब
से पड़ोस की राशन की दुकान पर न जाकर ऑनलाइन बिस्तर पर बैठे रोजमर्रा का सामान गेट
पर ही मंगाया जाने लगा है । कुछ लोगों को चूल्हा जलाकर भोजन बनाने में भी आलस आने
लगा है सक्षम लोग ऑनलाइन ही भोजन ऑर्डर करने लगे हैं। ऐसे आलस भरे जीवन में पौधों
का पालन-पोषण करना कुछ आलसी लोगों के लिए तो कठिन ही प्रतीत होता है।
वास्तव में आप प्रकृति के लिए कुछ
करना चाहते हैं या एक सकारात्मक परिवर्तन होता देखना चाहते हैं, तो शुरुआत हमें
स्वयं से करनी पड़ेगी । इसके लिए हमें कोई बहुत बड़ा युद्ध करने की आवश्यकता नहीं
है। बस हमें दैनिक दिनचर्या में बहुत छोटे-छोटे परिवर्तन करने पड़ेंगें, जब यही परिवर्तन सामूहिक रूप से होने लगते हैं तो बड़ा परिवर्तन देखने को
मिलता है। यदि हम छोटा सा उदाहरण पॉलीथीन का ले, तो हम देखते हैं कि शाम को जब हम बाजार
सब्जी लेने जाते हैं और आलू, प्याज, टमाटर,
गोभी, खीरा, धनिया,
मिर्च, नींबू सिर्फ इतना ही लेते हैं, तो कम
से कम 4 पॉलीथीन हो जाती हैं और उन 4 पॉलीथीन
को रखने के लिए एक बड़ी पॉलीथीन, जिनका उपयोग सिर्फ इतना ही
है कि वह सिर्फ सब्जी को दुकान से घर लाकर फ्रिज अथवा टोकरी में सब्जी को डालने तक
ही प्रयोग होती है। उसके बाद या तो कूड़ेदान में फेंक दी जाती है अथवा किसी बड़ी पॉलीथीन
में, भविष्य में कभी आवश्यकता पड़ेगी यह सोचकर एकत्र की जाती है। एक दिन में 5 पॉलीथीन और यदि हम महीने में 10 दिन ही सब्जी लायें,
तो लगभग 50 पॉलीथीन एक महीने में । यदि हम 140 करोड़ की जनसँख्या वाले देश में 14 सदस्यों का एक
बड़ा परिवार मानकर भी तुलना करें तो 10 करोड़ परिवार अर्थात्
एक महीने में 500 करोड़ पॉलीथीन, साल भर
में 6,000 करोंड़ पॉलीथीन । इसी प्रकार
राशन लेने जाते हैं तो घर में पॉलीथीन का भंडार लग जाता है।
इसका एक छोटा सा विकल्प है कि यदि
कभी हम सब्जी लेने जाएँ तो अपने साथ कपड़े का थैला ले जाएँ । यदि किसी दिन थैला ले
जाना भूल गए तो अगली बार जब सब्जी लें तो उसे पॉलीथीन वापस कर दें । इससे उसके भी
कुछ पैसे बच जायेंगें और सार्वजानिक रूप में एक बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा।
ऐसे में कई बुद्धिजीवी सलाह देते
हैं कि सरकार को सिंगल यूज प्लास्टिक को बंद कर देना चाहिए, पैक्ड चिप्स, कुरकुरे, नमकीन
की पॉलीथीन रिसाइकल हो जाती है। ऐसे में क्या आपको लगता है कि आपके द्वारा प्रयोग
की गई सभी प्रकार की पॉलीथीन रिसाइकल प्लांट तक पहुँच जाती है? नहीं । वह इधर-उधर घूमती
रहती है। पॉलीथीन आर्थिक और बाजार की गतिविधियों का एक बड़ा भाग बन गई है। वर्तमान
स्थितियों को देखते हुए इसके प्रयोग को ख़त्म नहीं किया जा सकता। “हाँ” इसके प्रयोग
को कम किया जा सकता हैं। हमें अपने स्तर से अधिकतम जितना प्रयास हो सकें करना
चाहिए। यही छोटे-छोटे प्रयास एक दिन बड़े परिवर्तन का कारण बनते हैं।
इसी प्रकार ए.सी. और फ़िल्टर से
निकलने वाले पानी को व्यर्थ ही नाली में न बहाकर उसे हम पौधों अथवा वॉशरूम में
प्रयोग कर सकते हैं। प्रयोग न होने पर बिजली के बल्ब और पंखें को बंद कर सकते हैं।
हम अपने जीवन में यह प्रण ले सकते हैं कि सीढ़ी चढ़ने के लिए न सही, पर उतरने के
लिए हम लिफ्ट का प्रयोग नहीं करेंगें। हमें 500 मीटर या एक
किलोमीटर की दूरी तक का कोई कार्य है तो बेवजह वाहन का प्रयोग नहीं करेंगें,
इससे न सिर्फ आपका स्वास्थ्य अच्छा रहेगा, पैसे
की बचत होगी और पर्यावरण भी अच्छा होगा।
इसी प्रकार के छोटे-छोटे परिवर्तन
समाज और प्रकृति में एक बड़ा बदलाव ला सकते हैं, परन्तु शर्त
यह है कि शुरुआत हम से हो ।
-प्रशान्त मिश्र
(लेखक
सामाजिक चिन्तक और विचारक हैं)
मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश
Sunday, February 22, 2026
उत्तर प्रदेश त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की निर्वाचक नामावली का पुनरीक्षण
Saturday, February 14, 2026
प्रदेश की ग्राम पंचायतों के ISO Certification कराए जाने के सम्बन्ध में
पंचायत सहायक द्वारा ग्राम सचिवालय/पंचायत भवन नियमित रूप से खोले जाने के सम्बन्ध में
नोट:- इस पटल पर प्रकाशित किसी भी प्रकार की जानकारी के प्रमाणित होने की जिम्मेदारी प्रकाशक की नहीं है..
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स्त्रोत- जन गणना कार्य र्निदेशालय, उत्तर प्रदेश
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अध्याय-४ समूह/ग्राम संगठन/संकुल संघ को प्राप्त होने वाली निधियाँ स्वयं सहायता समूह बचत के अलावा बैंक से ऋण भी प्राप्त करेंगें। ह...
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उपरोक्त जानकारी के प्रमाणिक होने अथवा न होने में प्रकाशक की कोई जिम्मेदारी नहीं है





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