प्रकृति
का संरक्षण हमारी नैतिक जिम्मेदारी है
हम
प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाएँ,
दोषारोपण
का कार्य दूसरों पर छोड़ दें।
गर्मी का मौसम आ रहा है, अब सभी को पेड़ों की याद आएगी, और मनुष्य पेड़ काट-काट
कर ऊँची-ऊँची इमारतें खड़ी कर रहा है यह भी महसूस होने लगेगा । जब कड़ी धूप में घर
से बाहर निकलेंगें तो पेड़ों की छाया और ठंडक की आवश्यकता महसूस होगी, कई बार मन में ख्याल भी आएगा कि “मनुष्य कितना स्वार्थी होता जा रहा है कि
उसे पर्यावरण की तनिक भी चिंता नहीं है, न ही उसे पेड़ पौधे
लगाने का कोई विचार आता है”। यदि हमारी भावनाएं और अधिक विकराल होंगी तो हम राज्य
सरकार और केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहरा अपने मन को तसल्ली दे देंगें । फिर मजबूत
संकल्प के साथ विचार करेंगें कि यदि मैं किसी उच्च अथवा सत्ता पक्ष में नेतृत्व की
भूमिका में होता तो आज चारों तरफ हरियाली ही हरियाली होती। यह सोच-सोच कर हमारा मन
हर्ष उल्लास से भर जायेगा और हम अपने घर चलें जायेंगें। अगले दिन फिर हमें किसी
कारण से धूप में निकलना पड़ा तो हम पुनः यही विचारों का एक मकड़जाल बना कर राहत की
साँस लेंगें
संभवतः यह पढ़कर आपको थोड़ा अजीब
लगे परन्तु शहरी क्षेत्रों में अधिकाशं व्यक्तियों का जीवन गर्मियों के मौसम में
इतनी चिंता तक ही सीमित रहता है, जिनका चिंतन थोड़ा अधिक हो
जाता है वह आस-पास की किसी नर्सरी से छोटे से गमले में एक-दो पौधे ले आते हैं और
अपने घरों की छत अथवा बालकनी में रख देते हैं । यदि आप बाकि लोगों से थोड़ा अधिक
सजग और जागरूक हैं तो आस-पास के पार्क में पौधे लगाने और उसका संरक्षण करने का
प्रयास करते हैं। इनसे भी जो अधिक सजग हैं वो सामूहिक रूप से पौधे लगाने का
कार्यक्रम करते हैं और जन-जागरूकता अभियान जैसे आयोजन का प्रयास करते हैं। ठीक है
कुछ नहीं से कुछ तो भला।
यदि आपका मन भी प्रकृति के साथ
जुड़ा हुआ है और आपको पेड़-पौधे, जलीय जीवन की चिंता होती
है तो अभी आपके मन में प्रकृति के प्रति संवेदना है। वास्तव में शहरी क्षेत्रों
में मनुष्य का जीवन आर्थिक गतिविधियों के कुशल संचालन और परिवार के भरण पोषण में
इतना उलझ कर रह गया है कि वह चाहते हुए भी बहुत से कार्य नहीं कर पा रहा है । घरों
का क्षेत्रफल दिन पर दिन छोटा होता जा रहा है, जिन लोगों ने
एकांकी जीवन का चयन करते हुए अथवा सुविधाओं को देखते हुए ऊँची इमारतों में अपना
फ़्लैट ले लिया है उनके यहाँ छतों की जगह छोटी बालकनी ने ले ली है, ऐसे में बड़े गमलों और पौधे लगाने की सम्भावना लगभग न के बराबर हो जाती है,
जो लोग किराये के मकान में हैं वह कभी मकान बदलना होगा तो क्या होगा?
इसकी चिंता में अधिकांश कम और छोटे पौधों को ही महत्त्व देते हैं । जिनके
पास स्वयं की छत भी है वह इस चिंता में उलझ जाते हैं कि पौधों का नियमित भरण पोषण
कैसे होगा ? उसमें खाद कब और कैसे पड़ेगी? इनसे भी बड़ी चिन्ता यह है कि गमलों में गर्मियों के मौसम में सुबह और शाम
दोनों समय पानी डालना पड़ता है, यदि दो दिन भी चूक हुई तो
पौधा सूखने लगेगा ।
जब से ऑनलाइन शॉपिंग का चलन बढ़ा है तब
से पड़ोस की राशन की दुकान पर न जाकर ऑनलाइन बिस्तर पर बैठे रोजमर्रा का सामान गेट
पर ही मंगाया जाने लगा है । कुछ लोगों को चूल्हा जलाकर भोजन बनाने में भी आलस आने
लगा है सक्षम लोग ऑनलाइन ही भोजन ऑर्डर करने लगे हैं। ऐसे आलस भरे जीवन में पौधों
का पालन-पोषण करना कुछ आलसी लोगों के लिए तो कठिन ही प्रतीत होता है।
वास्तव में आप प्रकृति के लिए कुछ
करना चाहते हैं या एक सकारात्मक परिवर्तन होता देखना चाहते हैं, तो शुरुआत हमें
स्वयं से करनी पड़ेगी । इसके लिए हमें कोई बहुत बड़ा युद्ध करने की आवश्यकता नहीं
है। बस हमें दैनिक दिनचर्या में बहुत छोटे-छोटे परिवर्तन करने पड़ेंगें, जब यही परिवर्तन सामूहिक रूप से होने लगते हैं तो बड़ा परिवर्तन देखने को
मिलता है। यदि हम छोटा सा उदाहरण पॉलीथीन का ले, तो हम देखते हैं कि शाम को जब हम बाजार
सब्जी लेने जाते हैं और आलू, प्याज, टमाटर,
गोभी, खीरा, धनिया,
मिर्च, नींबू सिर्फ इतना ही लेते हैं, तो कम
से कम 4 पॉलीथीन हो जाती हैं और उन 4 पॉलीथीन
को रखने के लिए एक बड़ी पॉलीथीन, जिनका उपयोग सिर्फ इतना ही
है कि वह सिर्फ सब्जी को दुकान से घर लाकर फ्रिज अथवा टोकरी में सब्जी को डालने तक
ही प्रयोग होती है। उसके बाद या तो कूड़ेदान में फेंक दी जाती है अथवा किसी बड़ी पॉलीथीन
में, भविष्य में कभी आवश्यकता पड़ेगी यह सोचकर एकत्र की जाती है। एक दिन में 5 पॉलीथीन और यदि हम महीने में 10 दिन ही सब्जी लायें,
तो लगभग 50 पॉलीथीन एक महीने में । यदि हम 140 करोड़ की जनसँख्या वाले देश में 14 सदस्यों का एक
बड़ा परिवार मानकर भी तुलना करें तो 10 करोड़ परिवार अर्थात्
एक महीने में 500 करोड़ पॉलीथीन, साल भर
में 6,000 करोंड़ पॉलीथीन । इसी प्रकार
राशन लेने जाते हैं तो घर में पॉलीथीन का भंडार लग जाता है।
इसका एक छोटा सा विकल्प है कि यदि
कभी हम सब्जी लेने जाएँ तो अपने साथ कपड़े का थैला ले जाएँ । यदि किसी दिन थैला ले
जाना भूल गए तो अगली बार जब सब्जी लें तो उसे पॉलीथीन वापस कर दें । इससे उसके भी
कुछ पैसे बच जायेंगें और सार्वजानिक रूप में एक बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा।
ऐसे में कई बुद्धिजीवी सलाह देते
हैं कि सरकार को सिंगल यूज प्लास्टिक को बंद कर देना चाहिए, पैक्ड चिप्स, कुरकुरे, नमकीन
की पॉलीथीन रिसाइकल हो जाती है। ऐसे में क्या आपको लगता है कि आपके द्वारा प्रयोग
की गई सभी प्रकार की पॉलीथीन रिसाइकल प्लांट तक पहुँच जाती है? नहीं । वह इधर-उधर घूमती
रहती है। पॉलीथीन आर्थिक और बाजार की गतिविधियों का एक बड़ा भाग बन गई है। वर्तमान
स्थितियों को देखते हुए इसके प्रयोग को ख़त्म नहीं किया जा सकता। “हाँ” इसके प्रयोग
को कम किया जा सकता हैं। हमें अपने स्तर से अधिकतम जितना प्रयास हो सकें करना
चाहिए। यही छोटे-छोटे प्रयास एक दिन बड़े परिवर्तन का कारण बनते हैं।
इसी प्रकार ए.सी. और फ़िल्टर से
निकलने वाले पानी को व्यर्थ ही नाली में न बहाकर उसे हम पौधों अथवा वॉशरूम में
प्रयोग कर सकते हैं। प्रयोग न होने पर बिजली के बल्ब और पंखें को बंद कर सकते हैं।
हम अपने जीवन में यह प्रण ले सकते हैं कि सीढ़ी चढ़ने के लिए न सही, पर उतरने के
लिए हम लिफ्ट का प्रयोग नहीं करेंगें। हमें 500 मीटर या एक
किलोमीटर की दूरी तक का कोई कार्य है तो बेवजह वाहन का प्रयोग नहीं करेंगें,
इससे न सिर्फ आपका स्वास्थ्य अच्छा रहेगा, पैसे
की बचत होगी और पर्यावरण भी अच्छा होगा।
इसी प्रकार के छोटे-छोटे परिवर्तन
समाज और प्रकृति में एक बड़ा बदलाव ला सकते हैं, परन्तु शर्त
यह है कि शुरुआत हम से हो ।
-प्रशान्त मिश्र
(लेखक
सामाजिक चिन्तक और विचारक हैं)
मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश

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