अंधकार से प्रकाश का मार्ग है श्रीमद्भागवत महापुराण
जीवन की उलझनों के मकड़जाल में भी शान्त और एकाग्रचित्त रहने हेतु सहयोगी हो सकता है अध्ययन ।
भारत भूमि अनंत काल से ज्ञान की भूमि रही है, वर्तमान में जब कभी यह सुन और कहा जाता है कि भारत विश्व गुरु है अथवा बनेगा तो इसका साधारण शब्दों में भावार्थ सम्पूर्ण विश्व और मानव जाति को दिशा और दशा प्रदान करने की असीम शक्ति के संचार केंद्र के रूप में भारत देश को देखना है । यह ज्ञान एक या दो दिन का पुस्तक अध्ययन नहीं है । यह प्राचीन काल से अपने ह्रदय में ज्ञान का प्रकाश समेटे भारत देश का गौरवशाली इतिहास है ।
भारत के प्राचीन गुरुकुल, ऋषि, मुनियों के ज्ञान से सुसज्जित तक्षशिला विश्वविद्यालय, नालंदा विश्वविद्यालय, विक्रमशिला विश्वविद्यालय, कांचीपुरम, शारदापीठ ऐसे अनेकों ज्ञान के केंद्र भारत देश में ही रहे हैं। जिन्होंने समय-समय न सिर्फ अपना कार्य किया अपितु अपने ज्ञान के कौशल को साबित भी किया। कहते हैं कि ह्वेन सांग जब नालंदा विश्वविद्यालय गया तो उस समय वहाँ लगभग 10,000 से अधिक छात्र एवं 1,510 शिक्षक थे। जिनमें तिब्बत, जापान, कोरिया, सुमात्रा, श्रीलंका सहित विश्व के कई देशों के छात्र वहां अध्ययन कर रहे थे ।
वर्तमान में आधुनिक शिक्षा पद्धति में ज्ञान अर्जन एवं विश्वविद्यालय का स्वरुप अवश्य परिवर्तित हुआ है परन्तु भारतीय शिक्षा अब भी अपने अलौकिक ज्ञान के कारण समृद्ध है ।
भारतीय धार्मिक ग्रन्थ ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद अथर्ववेद, जिन्हें हम वेद कहतें हैं। इनके साथ ही उपनिषद, पुराण, रामायण, श्रीमद्भागवत गीता, मनुस्मृति सबका अपना-अपना महत्त्व है जो सम्पूर्ण मानव जगत को सही जीवन की दिशा प्रदान करते हैं। इन्हीं में से एक है श्रीमद्भागवत महापुराण । जो जीवन की जटिल परिस्थितियों में सही मार्ग का चयन करने की प्रेरणा देता है यह ग्रन्थ केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों को भी मजबूत करता है।
एक उदाहरण के रूप में देखें तो श्रीमद्भागवत महापुराण के तृतीय स्कंध के क्रमश: २८, २९, ३० वें श्लोक में युवा अवस्था और उसके व्यवहार का वर्णन देखने को मिलता है: -
इत्येवं शैशवं भुक्त्वा दुःखं पौगण्डमेव च।
अलब्धाभिप्सितोऽज्ञानादिद्धमन्युः शुचार्पितः ॥ २८॥
सह देहेन मानेन वर्धमानेन मन्युना।
करोति विग्रहं कामी कामिष्वन्ताय चात्मनः ॥ २९॥
भूतैः पञ्चभिरारब्धे देहे देह्यबुधोऽसकृत्।
अहं ममेत्यसद्ग्राहः करोति कुमतिर्मतिम् ॥ ३०॥
जब एक बालक अपनी बाल्य अवस्था से अपनी युवावस्था में पहुँचता है। इस समय यदि उसे कोई इच्छित भोग नहीं प्राप्त होता है, तो अज्ञानतावश उसका क्रोध उत्पन्न होने लगता है और वह शोकाकुल हो जाता है। देह के साथ ही साथ अभिमान और क्रोध बढ़ जाने के कारण वह कामपरवश जीव अपना ही नाश करने के लिए दूसरे कामी पुरुषों के साथ वैर ठानता है। खोटी बुद्धिवाला वह अज्ञानी जीव पंचभूतों से रचे हुए इस देह में मिथ्याभिनिवेश के कारण निरन्तर मैं-मेरेपन का अभिमान करने लगता है।
यह एक व्यवहारिक ज्ञान का उदाहरण है जिनको इसकी जानकारी होती है उनकी समझ का दायरा अधिक होता जाता है और जो आज भी इससे अनभिज्ञ है वह यह व्यवहार क्यों ? और किसलिए? इसका समाधान क्या होगा? इसकी उलझनों में ही उलझे रहते हैं । किस काल परिस्थिति में क्या करना उचित होगा? यह घटना क्यों घटित हो रही है? इसका भाव एवं कारण पूर्व से ही लिखित है। अंतर इतना है जो पढ़ गए वो समझ गए और जिनको जानकारी नहीं है वह चिंतित रहते हैं।
गीताप्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवत महापुराण दो खण्डों में है, प्रथम खण्ड स्कंध 1 से स्कन्ध 8 तक है जिसके प्रारम्भ में श्रीमद्भागवत की पूजन-विधि तथा विनियोग, न्यास एवं ध्यान विधि का वर्णन है तथा द्वितीय खण्ड स्कन्ध 9 से स्कन्ध 12 तक है। यह महापुराण गुजराती, मराठी, बंगला, ओड़िआ, अंग्रेजी, तेलगु, कन्नड़, मलयालम, तमिल भाषा में भी उपलब्ध है।
कहा जाता है कि लोक विख्यात श्रीमद्भागवत नामक पुराण का प्रतिदिन श्रद्धायुक्त होकर श्रवण करना चाहिए यही हमारे संतोष का कारण है। जो मनुष्य प्रतिदिन श्रीमद्भागवत महापुराण का पाठ करता है, उसे एक-एक अक्षर के उच्चारण के साथ कपिला गौ-दान देने का पुण्य प्राप्त होता है।
पंडित मदन मोहन मालवीय लिखते हैं कि "मुझको श्रीमद्भागवत में अत्यंत प्रेम है। मेरा विश्वास और अनुभव है कि इसके पढ़ने और सुनने से मनुष्य को ईश्वर का सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है और उनके चरण कमलों में अचल भक्ति होती है। इसके पढ़ने से मनुष्य को द्रण निश्चय हो जाता है कि इस संसार को रचने और पालन करने वाली कोई सर्वव्यापक शक्ति है”।
एक अनन्त त्रिकाल सच, चेतन शक्ति दिखात।
सिरजन, पालत, हरत, जग, महिमा बरनि न जात।।
इसी एक शक्ति को लोग ईश्वर, ब्रह्म, परमात्मा इत्यादि अनेक नामों से पुकारते हैं। श्रीमद्भागवत के पहले ही श्लोक में वेदव्यास जी ने ईश्वर के स्वरुप का वर्णन किया है कि जिससे इस संसार की सृष्टि, पालन और संहार होते हैं, जो त्रिकाल में सत्य है, अर्थात् जो सदा रहा भी, है भी और रहेगा भी, और जो अपने प्रकाश से अंधकार को सदा दूर रखता है, उस परम सत्य का हम ध्यान करते हैं।
जब तक मनुष्य श्रीमद्भागवत को पढ़े नहीं और उसकी इसमें श्रद्धा न हो, तब तक वह समझ नहीं सकता कि ज्ञान भक्ति वैराग्य का यह कितना विशाल समुद्र है । भागवत के पढ़ने से उसे यह विमल ज्ञान हो जाता है कि एक ही परमात्मा प्राणी-प्राणी में बैठा हुआ है और जब उसको यह ज्ञान हो जाता है, तब उसका अधर्म करने को मन नहीं करता है क्योंकि दूसरों को चोट पहुँचाना और अपने को चोट पहुँचाने के समान हो जाता है। मनुष्य में परस्पर प्रेम और प्राणि मात्र के प्रति दया का भाव स्थापित करने के लिए इससे बढ़कर कोई साधन नहीं है । वर्तमान समय में जब संसार के बहुत अधिक भागों में भयंकर युद्ध छिड़ा हुआ है, मनुष्य मात्र को इस पवित्र धर्म का उपदेश अत्यंत कल्याणकारी होगा ।
यह आवश्यक नहीं है कि आप सनातन जीवन शैली को मानने वाले हों या आप भगवान में विश्वास करते हों, यदि आप पूर्ण रूप से नास्तिक भीं हैं अथवा आप किसी अन्य पूजा पद्धति का पालन करते हैं, तब भी आपको जीवन में परमात्मा और उसके निरंकार अस्तित्व को जानने और समझने के लिए श्रीमद्भागवत महापुराण का पठन एवं पठान करना चाहिए। इस ग्रन्थ को सिर्फ एक धार्मिक चश्मे से देखना एक समझदार और बुद्धिजीवी व्यक्ति के लिए संकीर्ण सोच का प्रमाण हो सकता है। आप इसे एक सामान्य पुस्तक के रूप में पढ़े और बिना किसी प्रकार का पुस्तक के प्रति प्रतिबिम्ब अपने मस्तिष्क में बनायें हुए ।
- प्रशान्त मिश्र
(लेखक सामाजिक चिन्तक और विचारक हैं)
मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश
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