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Monday, May 11, 2020

गाँव से बढ़ती दुरी -प्रशान्त मिश्र

        

गाँव से बढ़ती दुरी 


        गाँव कोई भूभाग नहीं है न ही कोई क्षेत्र, जहाँ अशिक्षित और असभ्य, पिछड़े लोग रहते हैं। जहाँ सुख-सुविधा का अभाव है। जहाँ जीवन व्यतीत करने वाले आधुनिकता की कक्षा १ के छोटा अ, बड़ा आ, भी नहीं जानते।  यह एक जीवन शैली है जहाँ अपनत्व, प्रेम, संस्कार, दुलार, स्नेह का व्यापक भंडार है । यह एक बाग़ है जहाँ का छोटा पौधा भी बड़े वट वृक्षों के संरक्षण में खिलना सीखता है,अपने अनुजों को किस प्रकार संभाला जाता है उनको किस प्रकार सींच कर बड़ा किया जाता है यह कौशल उसके जीवन के अंकुरण के साथ ही उसमें संजोये जाते हैं। अपनी छाव से सभी  को आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करना, बिना किसी अहम् के अपने फलों से आम जन का पोषण करना यही जीवन की रीती है। गाँव जहाँ सुगन्ध है जीवन की, जहाँ एहसास है परिवार का। जहाँ दृश्य है प्रकृति की मनमोहक वास्तविक सुन्दरता का। जहाँ चारों ओर सादगी और हरियाली है । वास्तविक जीवन का आधार है हर छोटा-बड़ा एक परिवार है। जहाँ लोग सुख में दुःख में एक साथ खड़े होते हैं जहाँ बड़े से बड़े मुकदमें घरों में सुलझ जाते हैं । गाँव एक खुश्बू एक मिठास है गाँव अपनों और गैरों में अपनत्व का विश्वास है। 



  

          जब हम कल्पना करते हैं कि क्या खोया क्या पाया हमनें, तो ऐसा प्रतीत होता है कि एक बंद मुट्ठी से रेत फ़िसल रही है और हम इस एहसास में बैठे हैं कि मेरी मुट्ठी तो बंद है। यह स्वयं को तात्कालिक दिलासा तो देना हो सकता है, परन्तु जो जा रहा है वो तो चला ही जा रहा है। मनुष्य के जीवन का अर्थ है खुश रहना और उस ख़ुशी को अपनों  और  अपनों  के साथ बाँटना। हम ने खुश रहने का माध्यम तो तलाश लिया पर उसके लिए क्या गवां दिया यह अभी भी समझ ही नहीं पाए। गाँव में बड़ा परिवार था, जिम्मेदारियां थीं, बंधन था यही वास्तविक जिन्दगीं थी।  लेकिन हमें आजादी चाहिए थी। किससे बंधनों से , अपनों से।  मिल गई एक ऊँची इमारत, जो पिंजड़ा और पिंजड़े के पंछी का एहसास कराती है। अपनों   से   दुरी  जो  बस अपनों के होने का एहसास कराती है, आभास नहीं कराती । जहाँ लोग कुत्ता टहलाने में सम्मान और गाय में अपना अपमान समझते हैं । गाँव में कुल्हाड़ी से लकड़ी काट पेट भरना यदि अनपढ़ की निशानी थी तो हजारों रूपये खर्च कर जिम में लोहा उठाना कौन सी बुद्धिमानी है। ये आजादी थी तो वो खुला आसमान नीला जहान जहाँ जी भर कर उड़ने की आजदी थी तो वह क्या था । इसका हमें गहनता से चिंतन करना होगा, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, और हमारी आजादी की कल्पना ही हमारे जीवन की बेड़िया बन जाए ।

          

        शहरीकरण और बाजारीकरण के सांसारिक मोहजाल ने इन्सान को सुख सुविधा के नाम पर पंगु बना दिया है आपके शरीर की रोधक प्रतिरोधक क्षमता को क्षीण कर दिया है आपके १०० वर्ष के जीवन को ६० वर्ष में समेंट दिया है बेशक यह सौदा देखने में लाभ का प्रतीत हो परन्तु नुकसान तो हो गया है और वह भी एक दिन का नहीं अंनत काल का। यहाँ विषय शहरीकरण के विरोध का नहीं है, यहाँ विषय है बाजारीकरण के नाम पर संस्कृति के विरोध का, जीवन शैली से खिलवाड़ का । परिवर्तन जीवन का नियम है परन्तु परिवर्तन समाज और सभ्यता के हित में होना चाहिए । अविष्कार और खोज का अर्थ मानव जीवन को सरल बनाना है न कि जीवन में कुरीतियों और अक्षमता का विकास करना । हमारे द्वारा किया गया कोई भी कार्य वर्तमान में भले ही सामान्य और समाज के हित में प्रतीत होता हो, परन्तु उसके परिणाम बहुत व्यापक होते हैं। जो वर्तमान में दिशा देने का कार्य तो करते हैं परन्तु के समय के पश्चात् पथ भ्रमित करने में भी अपनी अहम् भूमिका का निर्वाह करते हैं।


-प्रशान्त मिश्र 


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