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Saturday, October 17, 2026

लेख- सोशल मीडिया के मकड़जाल में उलझती ज़िन्दगी

 सोशल मीडिया के मकड़जाल में उलझती जिन्दगी 

सोशल मीडिया ने जहाँ एक ओर दूर बैठे व्यक्ति को पास लाने का कार्य किया है,

 वहीं पास बैठे व्यक्ति को ही दूर कर दिया है।




          जब हम वास्तविक दुनिया को छोड़कर केवल आभासी दुनिया में अपने दैनिक जीवन का पूर्ण समय व्यतीत करने लगते हैं तो एक समय के बाद वही आभासी दुनिया ही हमें पूर्ण रूप से वास्तविक दुनिया प्रतीत होने लगती है । वर्तमान समय में अधिकांश लोग इसी आभासी दुनिया के मकड़जाल में उलझते जा रहे हैं । चिंता इस बात की है कि कहीं इस मकड़जाल में युवा पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी इतना न डूब जाये कि वापस निकलना ही मुश्किल हो जाये । 

      सोशल नेटवर्किंग साइट्स- Facebook, Instagram, LinkedIn, X, YouTube, WhatsApp पर अकाउंट बनाकर कंटेंट पोस्ट एवं शेयर करने का ट्रेंड युद्ध स्तर पर चलन में है । व्यक्तियों में लाइक, कमेंट और शेयर की होड़ सी लगी हुई है, अधिकांश व्यक्तियों का व्यवहार उसके पोस्ट पर आये लाइक और कमेंट पर निर्भर होने लगा है । 

      पहले आयोजन हेतु व्यक्तिगत रूप से आकर आमंत्रण देने की प्रथा थी अब व्हाट्सऐप पर मैसेज भेजकर ही औपचारिकता पूरी की जा रही है । आयोजन व्यक्तिगत मेल-जोल एवं सम्पर्क बढ़ाने के स्थान पर मात्र फोटो खिंचवाने और पोस्ट अपलोड करने तक ही सीमित रह गए हैं । हद तो तब हो जाती है जब एक मृत व्यक्ति के पार्थिव शरीर के साथ लोग सेल्फी लेने लगते हैं और शोक सभा में फोटो खिंचवाने की होड़ सी लग जाती है ।    

       वर्तमान में राजनैतिक पार्टियाँ समाज और जनता में सकरात्मक और नकरात्मक विषयों पर नैरेटिव स्थापित करने के लिए सोशल मीडिया का प्रयोग बड़ी मात्रा में कर रही हैं । इनके यहाँ विधिवत रूप से आईटी सेल और सोशल मीडिया के प्रभारियों की नियुक्तियां की जा रही हैं । जो दिन भर जनता में किसी भी विषय को लेकर नैरेटिव सेट करने का कार्य कर रहे हैं । राजनेता और इस प्रकार की विचारधारा रखने वाले लोगों ने तो अपने साथ इसी कार्य के लिए एक या अधिक कर्मचारियों को नौकरियों पर भी रख रखा है ।

      सोशल मीडिया का प्रयोग छोटे-बड़े व्यापारी, लघु-कुटीर उद्योग और बड़ी-बड़ी कम्पनियां अपने प्रचार-प्रसार के लिए भी बहुत बड़ी मात्रा में कर रहे हैं । जब से AI तकनीक का विकास हुआ है तब से तो यह भी देखने में मिलता है कि यदि आपने अपने फोन के समीप केवल मुख से किसी भी उत्पाद अथवा सर्विस की बात भी की तो उसके बारे में निर्मित कंटेंट स्वतः ही आपके फोन के एप्लीकेशन, सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर प्रदर्शित होने लगता है । जिसका प्रयोग व्यापारी अपना सामान बेचने के लिए कर रहे हैं । धीरे- धीरे यह हमारी सोचने समझने की शक्ति को प्रभावित कर रहा है ।

      अधिकाशं माँ अपने बच्चों को छोटी उम्र में हाथ में मोबाइल दे रही हैं । जिससे उनका बच्चे के साथ लगने वाला परिश्रम तो बच जाता है, परन्तु उस बच्चे के मानसिक और शारीरिक विकास को वह फोन चलाने की आदत कहीं न कहीं बहुत बुरी तरह से प्रभावित कर रही है । बच्चों के लम्बे समय तक स्क्रीन देखने से उनकी आँखों की मांसपेशियों पर दबाव पड़ रहा है यह उनमें सिरदर्द की समस्या पैदा कर सकता है । बच्चों में माइग्रेन जैसी परेशानी भी हो सकती है । बच्चों में जरुरत से ज्यादा फोन इस्तेमाल करने से चिड़चिड़ापन और तनाव जैसी शिकायतें बड़ी संख्या में देखने और सुनने को मिल रही हैं ।                        

       परिवारों में टूट का एक बड़ा कारण भी सोशल मीडिया बनती जा रही है । घर में साथ होते हुए भी सभी अपने-अपने फोन में लगे रहते हैं आपसी संवाद बिल्कुल समाप्ति की ओर है । लोगों का पूरा दिन सिर्फ अंगूठे से रील को आगे बढ़ाने और सोशल मीडिया पर लाइक और फॉलोअर के लिए घूमने, शॉपिंग, पार्टी की फोटो साझा करने में निकल रहा है । वहीं इसने एक दूसरे से अनौपचारिक प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया है । विशेष रूप से इन्हें देखकर महिलाओं में हीन भावना का संचार एवं अपेक्षाओं का कई गुना बढ़ जाना आम बात हो गई है । जिसमें सम्बंधित नकारात्मक विचारों वाली रील की बाढ़ उनके विवेक को बहा कर ले जाती हैं । परिणामस्वरुप बहुत से परिवारों, संबधों में आपसी कलह अब एक सामान्य घटना बन गई है । 

       अपराध जगत को भी सोशल मीडिया ने बहुत बढ़ावा दिया है ।  लव जिहाद, हनी ट्रैप, ब्लैकमेल, ठगी जैसे कई बड़े और संगीन अपराध भी इसी के द्वारा अंजाम दिए जा रहे हैं । एक परिवार का घूमने के लिए घर से बाहर पहाड़ों पर जाना और पीछे से चोरों के द्वारा घर को साफ कर देना ऐसे कई उदाहरण हैं ।  यहाँ आपको ये समझाने की आवश्यकता नहीं है कि चोरों को कैसे पता चला ? कि कोई घर पर नहीं हैं । ये बात आपसे जुड़े सोशल मीडिया के सभी लोगों को पता थी, जो आपने स्वयं सोशल मीडिया पर फोटो पोस्ट कर बताई थी । कुछ दिनों पहले का ही एक वाक्या है जिसमें एक व्यक्ति के घर चोरी हुई थी क्योंकि उसकी पत्नी ने रील बनाते हुए सोने-चाँदी के जेवरों की फोटो सोशल मीडिया पर पोस्ट की थी ।     

       एक पढ़ा लिखा सामान्य व्यक्ति भी यह सब जानते हुए भी सोशल मीडिया के फॉलोअर, लाइक और शेयर को ही अपने जीवन की उपलब्धि समझने लगा है । यह कहीं न कहीं उनकी मनोदशा को प्रभावित कर रहा है । YouTube और Facebook जैसी सोशल साइट्स ने रील और कंटेंट जनरेशन के माध्यम से कई लोगों को रोजगार और आय का साधन दिया है । यह बात माननी होगी, लेकिन इस प्रकार की आय को अर्जित करने में दूषित विचारों एवं भ्रम को जिस तरह फैलाया जा रहा है यह चिंतनीय हैं । इससे भी अधिक चिंता का विषय समाज में आ रही अश्लीलता, फूहड़पन की भावना किसी भी सभ्य और सुसंस्कृत समाज को शोभा नहीं देता । विशेषकर भारत जैसे देश में जहाँ एक स्त्री के अपमान का बदला लेने के लिए पूरी महाभारत हो गई हो ।             

       यहाँ मैं किसी भी प्रकार के सोशल मीडिया के प्रयोग के विरोध में नहीं हूँ, हम सोशल मीडिया को अपने एक टूल की तरह प्रयोग करें, तकनीक का प्रयोग सुविधा के लिए करें । हम और हमारा जीवन पूर्ण रूप से यदि इस पर आश्रित हो जाएगा तो यह चिंता का विषय है । इसके विपरीत यदि सोशल मीडिया हमारा ही प्रयोग करने लगता है तो यह इससे भी अधिक भयावह विषय है ।  अंत में इतना ही आग्रह है कि इंटरनेट और सोशल मीडिया के मकड़जाल को समझकर सहयोगी के रूप में इसका उपयोग करें, इसमें उलझ न जाएँ।

-प्रशान्त मिश्र 

(लेखक सामाजिक चिन्तक और विचारक हैं) 

जिला- मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश 


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