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Sunday, November 1, 2026

लेख- अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर अपशब्द स्वीकार्य नहीं

अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर अपशब्द स्वीकार्य नहीं

लोकतंत्र में विचारों की स्वतंत्रता जितनी आवश्यक है,

उतनी ही भाषा की मर्यादा भी महत्त्वपूर्ण है

    भारत एक लोकतांत्रिक देश है, लोकतंत्र का अर्थ है एक ऐसी शासन व्यवस्था जिसमें जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है और उन्हीं प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन चलाया जाता है । लोकतंत्र दो शब्दों से मिलकर बना है पहला है ‘लोक’ अर्थात् ‘जनता’ और दूसरा है ‘तंत्र’ अर्थात् ‘शासन व्यवस्था’ । जनता का, जनता के द्वारा जनता के लिए शासन ही लोकतंत्र है।  

    भारत देश का संविधान देश के नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान करता है, साथ ही मौलिक कर्तव्यों की अपेक्षा भी करता है। लेकिन होता ये है कि हम मौलिक अधिकार तो याद रखते हैं लेकिन जब बात कर्तव्यों की आती है तो कहीं न कहीं हमारी याददाश्त थोड़ी कमजोर हो जाती है। ऐसा भी हो सकता है कि हम कर्तव्यों के प्रति ध्यान ही नहीं देना चाहते है या देना जरुरी नहीं समझते हैं। संविधान के भाग 3 को ‘मैग्नाकार्टा’ की संज्ञा दी गई है इसी में अनुच्छेद 12 से लेकर 35 तक मौलिक अधिकारों का विवरण है - समानता, स्वतंत्रता, शोषण के विरुद्ध, धर्म की स्वतंत्रता, संस्कृति और शिक्षा सम्बन्धी एवं संवैधानिक उपचार का अधिकार । लेकिन इसमें जो सबसे ज्यादा दुहाई दी जाती है वो अनुच्छेद 19 से 22 के मध्य स्वतंत्रता का अधिकार है। जो भाषण और अभिव्यक्ति की आजादी प्रदान करता है। शांतिपूर्ण ढंग से जमा होने और सभा करने का अधिकार देता है। भारत के किसी भी हिस्से में आने जाने रहने का अधिकार प्रदान करता है।

    लेकिन मुझे कहीं पर भी अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर किसी भी व्यक्ति को अपशब्द कहने, गाली देने, अभद्र टीका-टिप्पणी करने का अधिकार दिखाई नहीं देता है। संविधान की दुहाई देने वाले कथा-कथित स्वघोषित बुद्धिजीवियों में शायद ही दो-चार ऐसे हों जिन्होंने कभी संविधान की पुस्तक को खोलकर देखा हो और पढ़ा हो, न ही उपद्रवी प्रदर्शनकारियों को अतीत की जानकारी है न ही देश के भविष्य की चिंता ।

    सामाजिक एवं राजनैतिक जीवन में वैचारिक मतभेद होना आम बात है, कई बार हम सत्ता पक्ष अथवा विपक्ष के विचारों एवं कार्य पद्धति को पसन्द नहीं करते उसके प्रति सदन में अथवा राजनैतिक मंचों से अपनी राय प्रकट करते हैं और करना भी चाहिए। यह स्वीकार्य है और होने भी चाहिए। लेकिन मात्र पद की लालसा में अपने पद की गरिमा और शिष्टाचार को भूल कर अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर हाथ में संविधान की प्रति लेकर सड़कों पर उत्पात करना, और भारत तेरे टुकडें होंगें, इंशा अल्लाह! इंशा अल्लाह!, हमें चाहिए आजादी, अफजल हम शर्मिंदा हैं तेरे कातिल जिन्दा हैं, मोदी तेरी कब्र खुदेगी जैसे नारे लगाने वालों का समर्थन करना, अमर्यादित भाषा और अपशब्दों का प्रयोग करना, यह उचित नहीं है ।

    भारत देश में अव्यवस्था पैदा करते हुए यह ख्वाब देखना की भारत को भी श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल और फ्रांस बना देंगें। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के भविष्य के लिए प्रश्न चिन्ह अंकित करता है। यह देश की संप्रभुता और अखंडता के लिए घातक है। यह निंदनीय है और सरकार को ऐसा करने वालों पर कठोर से कठोर कार्यवाही करनी चाहिए।

    दिल्ली जंतर मंतर पर हुआ प्रोटेस्ट इस बात का प्रत्यक्ष उदाहरण है जिसने भाषा की मर्यादा और पद की गरिमा को तार-तार कर दिया है। कथा कथित वामपंथियों ने एक हथकंडा और अपना रखा है, 18 वर्ष से कम आयु की लड़कियों को ढाल बनाकर उनसे अनाप-शनाप बयानबाजी करवाना। जब उन पर पुलिस प्रशासन के द्वारा किसी प्रकार की कोई कार्यवाही की जाए तो माइनर बोलकर उसका बचाव करना और लोकतंत्र ख़तरे में पड़ गया है इसकी दुहाई देना। लेकिन यदि कोई 18 वर्ष से कम आयु का अबोध कहा जाने वाला बच्चा कोई राष्ट्रीय एकता, अखंडता और शांति को नुकसान पहुँचाने वाला कोई अपराध करता है तो उसके अभिभावकों पर कोई दण्डात्मक कार्यवाही हो, यह सुनिश्चित करना सरकार और विशेष रूप से कोर्ट की ही जिम्मेदारी है।

    जब से सोशल मीडिया ने लोगों को स्टार बनाना शुरू किया है तब से लाइक और कमेंट का सहारा लेकर वयारल होने का चलन बखूबी चल रहा है। विशेष रूप से मोदी-योगी, भाजपा सरकार को गाली देना, धर्म के नाम पर टीका- टिप्पणी करना, अपशब्द बोलना आम बात हो गई है । देश में कई ऐसे लोग भी है जो केवल सोशल मीडिया पर अभद्र टीका-टिप्पणी करके रातों-रात वायरल हो गए। उन्होंने अपनी जीविकापार्जन का साधन ही ऐसी ही ऐसी अभद्र भाषा को बना लिया है। कथा कथित स्वयं को बुद्धिजीवी कहने वाला बड़ा वर्ग इसे सपोर्ट भी करता है।                   

    वर्तमान में सभी विपक्षी राजनैतिक दल देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हटाने के लिए आतुर हैं लेकिन मोदी को हटा कर प्रधानमंत्री किसे बनाना है यह पता नहीं। सभी राजनैतिक दलों को सत्ता चाहिए, पर सत्ता पा कर करेंगें क्या? यह अभी तक निर्णय नहीं किया है। कब तक करेंगें ? ये भी पता नहीं।

    यहाँ राजनैतिक दलों को एक बात तो विशेष रूप से समझनी चाहिए कि विगत 12 वर्षों में भारतीय राजनीति की दिशा और दशा दोनों बदल गई है। अब आप सिर्फ झूठे वादों के भरोसे, सत्ता नहीं प्राप्त कर सकते, आपको जनता को भविष्य के लिए आश्वस्त करना होगा। वर्तमान सोशल मीडिया का युग है यहाँ कथनी और करनी में अन्तर होना संभव नहीं है। आप चाहते हुए भी अपने दिए गए बयान से नहीं पलट सकते। जनता पहले से बहुत होशियार हो गई है। वह आपके द्वारा कहे गए एक-एक शब्द का अवलोकन करती है आंकलन करती है। उस सम्बन्ध में आपके द्वारा पूर्व में  कहे गए विचार को पल भर में खोज निकालती है। आप झूठे नैरेटिव को फैलाकर कुछ समय के लिए अपने पक्ष में माहौल बना तो सकते हैं लेकिन यह हवा का गुब्बारा कब फूट जायेगा ये पता नहीं।

    एक सभ्य समाज की पहचान इस बात से नहीं होती की आपकी आवाज कितनी ऊँची हैं या कितने लोगों के द्वारा सुनी गई। एक सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि आपने अपना असंतोष अपनी असहमति कितने सम्मानजनक रूप से व्यक्त की । मुँह में जिह्वा सभी के है लेकिन उसका अपने विवेक के साथ कितना प्रयोग करना है और कहाँ करना है इसकी चिंता भी हमें ही करनी होगी। कई बार हम बोलते समय यह भूल जाते हैं कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से लोग हमें सुन रहे हैं, हो सकता है कि वह हमारा अनुसरण भी करते हों । यदि आपके गलत आचरण के अनुसरण की प्रक्रिया, चलती चली गई तो समाज का एक बड़ा वर्ग दूषित भाषा के प्रभाव से और भी अधिक दूषित हो जायेगा। इसकी चिंता भी हमें ही करनी होगी।      

-         प्रशान्त मिश्र

(लेखक सामाजिक चिन्तक और विचारक हैं)

जिला- मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश



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