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Tuesday, October 7, 2025

शासनादेश GPDP (2026-27) ग्राम पंचायत विकास योजना, उत्तर प्रदेश Gram Panchayat Development Plan, Uttar Pradesh

 ग्राम पंचायत विकास योजना - GPDP 

वित्तीय वर्ष :- 2026-27

सहभागी ग्राम पंचायत विकास योजना के सम्बन्ध में दिशा निर्देश जारी कर दिए गए हैं, विभिन्न सहयोगी विभागों के द्वारा जनपद स्तरीय अधिकारियों द्वारा जन योजना अभियान की अवधि में आयोजित विशेष ग्राम सभा की बैठक में केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा संचालित प्रमुख फ्लैगशिप योजनाओं की सूचना उपलब्ध कराया जाना सितम्बर, 2025  माह के तीसरे सप्ताह मे सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं वहीं
 
* वार्षिक कार्ययोजना तैयार किये जाने हेतु ग्राम सभा की कम से कम 02 बैठकों (प्रथम बैठक जागरूकता एवं कार्ययोजना पर विचार तथा द्वितीय बैठक कार्ययोजना कार्ययोजना को अंतिम रूप दिया जाना) का अनिवार्य रूप से आयोजन के सम्बन्ध में भी निर्देश दिए गए हैं
* महिला सभा एवं बाल सभा के आयोजन, ग्राम सभा के आयोजन से पूर्व अनिवार्य रूप से किया जाए, जिसमें स्वास्थ्य, शिक्षा, महिला व बाल विकास, महिला कल्याण तथा जिला प्रोबेशन अधिकारी आदि की उपस्थिति हो

उक्त के साथ ही इस बार के पत्र में दिनांक 27 मई 2022 के पत्र को संलग्न किया गया है जिसका विषय Localization of SDGs (सतत् विकास के लक्ष्य के स्थानीयकरण) के क्रियान्वयन हेतु समस्त विभागों के स्तर से आवश्यक कार्यवाही किये जाने के सम्बन्ध में था /  इस पत्र में सम्बंधित विभागों की भूमिका निर्धारित की गई थी। विस्तृत विवरण एवं पत्र की प्रति नीचे दी गई है:-    

संख्या:- आर.जी.एस.ए /58/2025, प्रेषक, निदेशक, पंचायती राज विभाग, उत्तर प्रदेश।

विषय:- 02 अक्टूबर, 2025 से 31 मार्च, 2026 के मध्य 2026-27 की सहभागी पंचायत विकास योजना/वार्षिक कार्य योजना तैयार किए जाने हेतु जन योजना अभियान (पी.पी.सी. कैम्पेन) के संचालन के सम्बन्ध में।

पंचायती राज मंत्रालय, भारत सरकार के अर्धशासकीय पत्र संख्या:- एम-11011/15/2025-सी.बी., दिनांक 17 सितम्बर, 2025 (छायाप्रति संलग्न) का सन्दर्भ ग्रहण करने का कष्ट करें. जिसके माध्यम से वर्ष 2026-27 की वार्षिक कार्ययोजना तैयार करने हेतु जन योजना अभियान का संचालन किए जाने एवं पत्र दिनांक 22 सितम्बर 2025 (छायाप्रति संलग्न) के द्वारा जनजाति कार्यमंत्रालय के द्वारा संचालित आदि कर्मयोगी अभियान के प्रभावी क्रियान्वयन किये जाने के निर्देश जारी किये गए हैं..  




























































Friday, October 3, 2025

श्रीरामचरितमानस : मानवीय मूल्यों का पथ प्रदर्शक


श्रीरामचरितमानस : मानवीय मूल्यों का पथ प्रदर्शक




 आदर्श एवं प्रकृति-समन्वित जीवन शैली के लिए श्रीरामचरितमानस का अध्ययन केवल धार्मिक दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि व्यावहारिक दृष्टि से भी आवश्यक है।

         निश्चय ही आप किसी भी पूजा-पद्धति को मानने वाले हों, किसी भी विचारधारा से प्रभावित हों, आस्तिक हों या नास्तिक, यह आपका मौलिक अधिकार है। अनुभव कहता है कि आस्था किसी भी व्यक्ति पर थोपी नहीं जा सकती। न ही किसी को मानसिक या शारीरिक रूप से प्रताड़ित कर किसी विचारधारा को मानने के लिए बाध्य किया जा सकता है। आस्था और निष्ठा व्यक्ति के समर्पण, संस्कार और जीवन-परिस्थितियों से प्राप्त अनुभव पर आधारित होती है।

            श्रीरामचरितमानस, श्रीमद् गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित वह अमूल्य ग्रंथ है, जो निरन्तर भारतीय संस्कृति को दिशा और दशा प्रदान करता रहा है । धार्मिक दृष्टि से भारतीय परंपरा और संस्कृति को मानने वाले लोग व्यक्तिगत तथा सार्वजनिक जीवन में इसका अनुसरण करते हैं, इसका पाठ करते हैं । छोटे- बड़े अनुष्ठानों के माध्यम से घरों, मंदिरों अथवा सार्वजनिक स्थानों पर इसके वाचन एवं पाठ के श्रवण का अवसर सामान्य रूप से देखने-सुनने को मिलता है। कारण स्पष्ट है प्रभु श्रीराम का चरित्र और उनकी जीवनशैली समाज को एक आदर्श स्वरुप प्रदान करती है। प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि वह श्रीराम के आचरण का अनुसरण करे और समाज के अन्य लोग भी उनके आदर्शों से प्रभावित होकर वैसा ही जीवन जिएं। यही संकल्पना इसके पाठ और आयोजन के पीछे निहित होती है।

        श्रीरामचरितमानस मानवीय आदर्शों का अनुपम उदाहरण है। जब हम एक आदर्श पुत्र की कल्पना करते हैं, तो सर्वप्रथम प्रभु श्रीराम का नाम आता है। उन्होंने पिता के वचन को निभाने के लिए राजपाठ और वैभव का त्याग किया और प्रसन्नतापूर्वक चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार किया।

        वर्तमान परिवेश में जब भाई-भाई का खून बहा रहा है, तब एक आदर्श भ्राता का स्वरूप खोजने की आवश्यकता होती है। लक्ष्मण का जीवन इसका अनुपम उदाहरण है। वे वनवास के दौरान बड़े भाई श्रीराम के सेवक की तरह साथ रहे और उनकी प्रत्येक छोटी-बड़ी कठिनाई को दूर करने का प्रयास करते रहे।

        भरत का चरित्र भी भ्रातृ-प्रेम और आदर्श का अद्वितीय उदाहरण है। उन्होंने यह जानते हुए भी कि राजसिंहासन पर उनका अधिकार हो सकता है, बड़े भाई राम की खड़ाऊँ को गद्दी पर रखकर चौदह वर्षों तक राज्य का संचालन किया।

        जब आदर्श पत्नी की चर्चा होती है, तो माता सीता का चरित्र स्मरण आता है। जनक नंदिनी सीता ने यह मानकर कि "पति के सुख-दुःख में साथ देना ही धर्म है", वनवास में श्रीराम के साथ जाने का निश्चय किया और जीवन की हर परिस्थिति में धर्म का निर्वाह किया।

        ये केवल कुछ उदाहरण हैं। श्रीरामचरितमानस ऐसे अनेकों उदाहरण से भरा हुआ है ।  जीवन की प्रत्येक स्थिति में किस प्रकार आचरण करना चाहिए, इसका पथ-प्रदर्शन रामचरितमानस सहजता से कर देता है।

        यह जीवन के हर आयाम में मार्गदर्शन करता है । श्रीरामचरितमानस आदर्श गृहस्थ जीवन, आदर्श राजधर्म, आदर्श पारिवारिक जीवन, आदर्श पतिव्रत धर्म और आदर्श भ्रातृ धर्म का बोध कराता है। इसके अतिरिक्त यह भक्ति, ज्ञान, त्याग, वैराग्य और सदाचार के नैतिक मूल्यों को भी समेटे हुए है। इसमें स्त्री-पुरुष, बालक, युवा और वृद्ध सभी के लिए उपदेश निहित हैं।

        सगुण-साकार भगवान की आदर्श मानव लीला, उनके गुण, प्रभाव, रहस्य तथा प्रेम के गहन तत्व को तुलसीदास जी ने सरल और रोचक शैली में प्रस्तुत किया है। यही कारण है कि यह ग्रंथ हर युग और हर परिस्थिति में प्रासंगिक बना रहता है।

        वर्तमान समय में इसकी आवश्यकता, इसका महत्त्व और अधिक बढ़ जाता है। आज जब चारों ओर हिंसा और अशांति व्याप्त है, जब मानव-मानव के बीच अविश्वास और स्वार्थ की दीवारें खड़ी हो गई हैं, जब विज्ञान की शक्ति का अधिकांश भाग विनाश के साधनों को विकसित करने में व्यर्थ हो रहा है, ऐसे समय में सुख, शांति और प्रेम का संदेश अत्यंत आवश्यक है।

        श्रीरामचरितमानस का अध्ययन और उसका जीवन में अनुपालन व्यक्ति को मानसिक तनाव से मुक्ति दिलाता है। यह सोचने-समझने और निर्णय लेने की क्षमता में उदारता लाता है। यदि इसके विचारों को आत्मसात किया जाए तो जीवन सरल, शांत और संतुलित बन सकता है।

        साथ ही तुलसीदास जी की विनम्रता का भाव हमें सदैव प्रेरणा देता है । कई लोग यह दावा कर सकते हैं कि उन्होंने श्रीरामचरितमानस का पूर्ण अध्ययन कर लिया है और उसके प्रत्येक शब्द व अक्षर का भाव समझ लिया है। किंतु यह कहना अपने-आप में अतिशयोक्ति होगा। तुलसीदास जी स्वयं कहते हैं-

कबि न होऊँ नहिं चतुर कहावउँ  । मति अनुरूप राम गुन गावउँ  ।।
कहँ रघुपति के चरित अपारा । कहँ मति मोरि निरत संसारा ।।

        अर्थात्, “मैं न तो कवि हूँ और न चतुर कहलाता हूँ। अपनी बुद्धि के अनुसार  श्रीरामजी के गुणों का गाता हूँ। कहाँ तो श्रीरघुनाथजी के अपार चरित्र, कहाँ संसार में आसक्त मेरी बुद्धि।

        यहाँ जिस ग्रंथ की चर्चा हो रही है, वह गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित तथा परम श्रद्धेय हनुमानप्रसाद पोद्दार द्वारा टीकाकार श्रीरामचरितमानस है। यह केवल हिंदी में ही नहीं, बल्कि उड़िया, तेलुगु, मराठी, गुजराती, कन्नड़, अंग्रेज़ी, नेपाली और असमिया सहित अनेक भाषाओं में प्रकाशित होता है। श्रीरामचरितमानस की शुरुआत परायण की विधि से होती है। इसके बाद क्रमशः बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, लंकाकाण्ड एवं अंत में उत्तरकाण्ड है । प्रत्येक दोहे एवं अक्षर का अपना-अपना महत्त्व है ।

        बालकांड के एक प्रसिद्ध दोहे (दोहा संख्या 5) में श्रीमद् गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं-

भलो भलाइहि पै लहइ निचाइहि नीचु ।
सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचू ।।

        अर्थात्, “भला भलाई ही ग्रहण करता है, और नीच नीचता को ही ग्रहण किये रहता है। अमृत की सराहना अमर करने में है और विष की मारने में।”

        यह दोहा जीवन का गूढ़ सत्य उजागर करता है, व्यक्ति वही ग्रहण करता है, जो उसके स्वभाव के अनुकूल होता है।

        यदि आप श्रीरामचरितमानस को केवल एक धार्मिक ग्रंथ मानकर देख रहे हैं, तो दृष्टिकोण बदलने की आवश्यकता है। चाहे आप किसी भी पंथ या पूजा-पद्धति को मानते हों, भले ही प्रभु श्रीराम में आस्था न रखते हों, फिर भी आदर्श जीवन शैली का इससे बड़ा और प्रत्यक्ष उदाहरण मिलना कठिन है।

        इसका अध्ययन और इसमें दिए गए आदर्शों का पालन न केवल सुख-शांति को बढ़ाता है, बल्कि मानसिक तनाव से मुक्ति भी दिलाता है। यह व्यक्ति को निर्णय लेने में विवेकशील और उदार बनाता है। अंततः जीवन आपका है और निर्णय भी आपको ही करना है कि आपको किस पथ का अनुसरण करना है।


डॉ. प्रशान्त कुमार मिश्र 
(सामाजिक चिन्तक एवं विचारक)
जिला- मुरादाबाद
सम्पर्क सूत्र- 7599022333

Monday, May 5, 2025

पाकिस्तान नाम की बीमारी का जड़ से उपचार जरुरी

 

पाकिस्तान नाम की बीमारी का जड़ से उपचार जरुरी

यदि आज भारत देश ने जरा भी हमदर्दी दिखाई तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी माफ़ नहीं करेंगीं

एक पिता का फर्ज होता है अपनी संतान की देखभाल करना, उसको सही परवरिश देना लेकिन जब आपकी संतान ही आपका गला दबाने लगे और आपके जीवन के लिए ही खतरा बनने लगे तो उस स्थिति में आपको भी लठ उठाकर उसे समझा देना चाहिए कि बाप बाप होता है और बेटा बेटा। बच्चों की छोटी मोटी गलतियों को नज़र अंदाज कर देना चाहिए। क्योंकि समय रहते ही उसे अपनी गलती का एहसास होगा। लेकिन जब बच्चा गलतियों पर गलतियाँ ही करते जाये तो उसका जड़ से समाधान करना नीति संगत भी है और आवश्यक भी। ठीक इसी प्रकार की स्थिति पाकिस्तान की भी  है, बच्चा अब सुधरने का नाम नहीं ले रहा है, अब उपचार जरुरी है वो भी ऐसा उपचार की मिसाल कायम हो ।

पृथ्वी राज चौहान ने मोहम्मद गौरी को प्रथम तराइन युद्ध 1191 में हराकर जीवनदान दिया, जबकि चाहते तो मार सकते थे। प्रतिफल में क्या मिला? यह क्षमा उन्हें बहुत भारी पड़ी, दुबारा आक्रमण और युद्ध, अंततः क्या हुआ? हम सभी जानते हैं। यदि पहली बार में ही पृथ्वीराज चौहान ने मृत्यु दंड दे दिया होता, तो आज इतिहास और वर्तमान कुछ और होता। 

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने भी 1971 के युद्ध में 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों को जीवन दान दिया बदलें में क्या मिला? रोज-रोज का आतंकवाद, कारगिल का युद्ध, बेगुनाहों की हत्या। यदि इंदिरा गाँधी ने 93,000 सैनिकों को कठोर सजा देने का निश्चय किया होता तो पाकिस्तान की आतंकवाद के नाम से ही आज रूह काँप जाती।          

 रामायण और गीता के ज्ञान से चल रहे राम और कृष्ण के देश में सिर्फ क्षमा ही नहीं सजा का भी विधान होना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियाँ युगों-युगों तक याद रखें। 

    भारत और पाकिस्तान के संबंध, पाकिस्तान के जन्म के समय सन् 1947 से ही तनावपूर्ण रहे हैं। पाकिस्तान के हमदर्दों की नीति मानवता विरोधी रही है। चाहे वह1947 में भारत के दो टुकड़े करना हो या 1965, 1971 और 1999 का कारगिल युद्ध, सभी पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का ही परिणाम है । इसके अलावा, आये दिन भारतीय सीमा में घुसपैठ और कश्मीर में आतंकी घटनाएँ पूरा विश्व अपनी आँखों से देख रहा है। सबसे गंभीर और अमानवीय पहलू यह है कि पाकिस्तान आज भी आतंकवादी संगठनों, जैसे लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, हिजबुल मुजाहिदीन आदि को खुले आम संरक्षण देता है।

2001 में संसद भवन परिसर में आतंकियों का घुस जाना, 2008 में मुंबई  के ताज होटल पर हमला, 2016 का उरी, 2019 में पुलवामा और अब पहलगाम में मासूम 26 हिन्दुओं की धर्म पूछकर हत्या करना, मानवता को झकझोर कर रख देता है। इन सभी में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की भूमिका स्पष्ट है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारत ने अनेक बार पाकिस्तान की आतंकी नीति को उजागर और प्रमाणित किया है। 

 भारत ने सदैव शांति की नीति अपनायी, परंतु पाकिस्तान ने बार-बार आतंकवाद, युद्ध और घुसपैठ का सहारा लिया और भारत की संप्रभुता, एकता और सुरक्षा को चुनौती दी है। बीते दशकों में पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद के कारण भारत ने न केवल सेना के अनेक वीर सपूतों को खोया है, बल्कि कई निर्दोष लोगों की जान भी गवायीं है। इन परिस्थितियों में अब यह आवश्यक हो गया है कि भारत सरकार और जनता मिलकर, पाकिस्तान का न सिर्फ सभी मोर्चों पर सम्पूर्ण बहिष्कार करें। अपितु पाकिस्तान नाम की बीमारी का जड़ से समाधान करें। यह सब होने के बाद भी पाकिस्तान से किसी भी प्रकार के संबंध रखना, न सिर्फ भारत की सुरक्षा के साथ समझौता है अपितु आने वाली पीढ़ियों के लिए भी घातक सिद्ध करना होगा ।

इसके साथ ही भारत और पाकिस्तान के बीच हो रहे सभी छोटे-बड़े सभी प्रकार के व्यापार पर पूर्ण विराम लगना चाहिए, व्यापार से पाकिस्तान को धन मिलता है।  जिसका प्रयोग वह आतंकवाद के पालन-पोषण में और भारत विरोधी गतिविधियों में करता है।

भारत में वर्षों से पाकिस्तानी गायकों, कलाकारों और अभिनेताओं को मंच और लोकप्रियता मिली है। परंतु दुर्भाग्य से जब भी भारत में आतंकवादी घटनाएं होती हैं, पाकिस्तानी कलाकार इसका विरोध तक नहीं करते।

ऐसे में यह आवश्यक हो गया है कि भारत पूरी तरह से पाकिस्तानी कलाकारों, अभिनेताओं यहाँ तक की सभी पाकिस्तानी नागरिकों का भी बहिष्कार करें। फिल्म जगत, टेलीविजन, संगीत, स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म – किसी भी स्थान पर पाकिस्तानी कलाकारों को न बुलाया जाए, न ही उन्हें प्रचार मिले। भारतीय जनता को भी इस दिशा में सजग रहना चाहिए भारत सरकार के द्वारा  सोशल मीडिया के प्लेटफोर्म पर बैन लगाने और पाकिस्तानी नागरिकों को वापस भेजने का प्रयास काबिले तारीफ है। लेकिन यह स्थायी होना चाहिए।  इसके साथ ही भारत में भी जो पाकिस्तान और आतंकवाद समर्थक हैं उन्हें भी कड़ी सजा मिलनी चाहिए।

भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच सदैव रोमांचक रहे हैं, परंतु अब यह सिर्फ खेल नहीं रहा। जब भी भारत-पाक मैच होता है, भारत में छिपे पाकिस्तान समर्थक तत्व सक्रिय हो जाते हैं। 

सन् 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि हुई थी, जिसके तहत भारत अपने ही जल संसाधनों का पूर्ण उपयोग नहीं कर सकता। इस संधि का पालन भारत ने आज तक निष्ठापूर्वक किया है। अब समय आ गया है कि भारत के द्वारा स्थगित की गई सिन्धु जल संधि को भी स्थायी रूप से समाप्त किया जाये और नदियों का शत प्रतिशत जल भारत में अपने राज्यों की सिंचाई, बिजली और पीने के पानी की जरूरतों के लिए करना चाहिए। इससे न केवल भारत को लाभ होगा, बल्कि पाकिस्तान की कृषि अर्थव्यवस्था पर भी दबाव बनेगा।

सरकार के प्रयास तब ही सफल हो सकते हैं जब जनता भी उसमें सक्रिय भूमिका निभायें। जो कहते हैं कि हम बोर्डर पर जा कर तो नहीं लड़ सकते, वे कम से कम सोशल मीडिया पर पाकिस्तान समर्थक प्रचार को रिपोर्ट कर सकते हैं,ब्लॉक कर सकते हैं, पाकिस्तान से जुड़े ऐप्स को अनइंस्टॉल कर सकते हैं सरकार द्वारा पाकिस्तान के नागरिकों को देश छोड़ कर जाने का जो आदेश हुआ है, उसके बाद भी देश में छिपे पाकिस्तानी नागरिकों की सूचना सरकार अथवा पुलिस को कर सकते हैं। हमें भी अपनी जिम्मेदारी उठानी होगी। देशभक्ति सिर्फ सीमा पर लड़ने से नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी के व्यवहार से भी प्रकट होती है ।

पाकिस्तान का सम्पूर्ण बहिष्कार समय की मांग है। यह केवल पाकिस्तान के खिलाफ कदम नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा, स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता की दिशा में एक दृढ़ निश्चय है। 

भारतीय नागरिकों को चाहिए कि वह पाकिस्तान को यह स्पष्ट संदेश दे कि अब और नहीं। अब भारत हर स्तर पर सशक्त है और किसी भी प्रकार के अपमान या आक्रमण को सहन नहीं करेगा। तभी देश की सरकार राजनीतिक इच्छाशक्ति, आर्थिक नीतियों, कूटनीतिक प्रयासों से अपना कार्य कर सकेगी। 

अब वक्त आ गया है पूरी दुनिया को यह बताने का कि भारत एक शांतिप्रिय देश है, लेकिन अपनी आत्मरक्षा और सम्मान की रक्षा करना भी जनता है, और जवाब देना भी।

प्रशान्त मिश्र 

(लेखक सामाजिक चिन्तक और विचारक हैं)

मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश 

सम्पर्क सूत्र- 7599022333


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