श्रीरामचरितमानस : मानवीय मूल्यों का पथ प्रदर्शक
आदर्श एवं प्रकृति-समन्वित जीवन शैली के लिए श्रीरामचरितमानस का अध्ययन केवल धार्मिक दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि व्यावहारिक दृष्टि से भी आवश्यक है।
निश्चय ही आप किसी भी पूजा-पद्धति को मानने वाले हों, किसी भी विचारधारा से प्रभावित हों, आस्तिक हों या नास्तिक, यह आपका मौलिक अधिकार है। अनुभव कहता है कि आस्था किसी भी व्यक्ति पर थोपी नहीं जा सकती। न ही किसी को मानसिक या शारीरिक रूप से प्रताड़ित कर किसी विचारधारा को मानने के लिए बाध्य किया जा सकता है। आस्था और निष्ठा व्यक्ति के समर्पण, संस्कार और जीवन-परिस्थितियों से प्राप्त अनुभव पर आधारित होती है।
श्रीरामचरितमानस, श्रीमद् गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित वह अमूल्य ग्रंथ है, जो निरन्तर भारतीय संस्कृति को दिशा और दशा प्रदान करता रहा है । धार्मिक दृष्टि से भारतीय परंपरा और संस्कृति को मानने वाले लोग व्यक्तिगत तथा सार्वजनिक जीवन में इसका अनुसरण करते हैं, इसका पाठ करते हैं । छोटे- बड़े अनुष्ठानों के माध्यम से घरों, मंदिरों अथवा सार्वजनिक स्थानों पर इसके वाचन एवं पाठ के श्रवण का अवसर सामान्य रूप से देखने-सुनने को मिलता है। कारण स्पष्ट है प्रभु श्रीराम का चरित्र और उनकी जीवनशैली समाज को एक आदर्श स्वरुप प्रदान करती है। प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि वह श्रीराम के आचरण का अनुसरण करे और समाज के अन्य लोग भी उनके आदर्शों से प्रभावित होकर वैसा ही जीवन जिएं। यही संकल्पना इसके पाठ और आयोजन के पीछे निहित होती है।
श्रीरामचरितमानस मानवीय आदर्शों का अनुपम उदाहरण है। जब हम एक आदर्श पुत्र की कल्पना करते हैं, तो सर्वप्रथम प्रभु श्रीराम का नाम आता है। उन्होंने पिता के वचन को निभाने के लिए राजपाठ और वैभव का त्याग किया और प्रसन्नतापूर्वक चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार किया।
वर्तमान परिवेश में जब भाई-भाई का खून बहा रहा है, तब एक आदर्श भ्राता का स्वरूप खोजने की आवश्यकता होती है। लक्ष्मण का जीवन इसका अनुपम उदाहरण है। वे वनवास के दौरान बड़े भाई श्रीराम के सेवक की तरह साथ रहे और उनकी प्रत्येक छोटी-बड़ी कठिनाई को दूर करने का प्रयास करते रहे।
भरत का चरित्र भी भ्रातृ-प्रेम और आदर्श का अद्वितीय उदाहरण है। उन्होंने यह जानते हुए भी कि राजसिंहासन पर उनका अधिकार हो सकता है, बड़े भाई राम की खड़ाऊँ को गद्दी पर रखकर चौदह वर्षों तक राज्य का संचालन किया।
जब आदर्श पत्नी की चर्चा होती है, तो माता सीता का चरित्र स्मरण आता है। जनक नंदिनी सीता ने यह मानकर कि "पति के सुख-दुःख में साथ देना ही धर्म है", वनवास में श्रीराम के साथ जाने का निश्चय किया और जीवन की हर परिस्थिति में धर्म का निर्वाह किया।
ये केवल कुछ उदाहरण हैं। श्रीरामचरितमानस ऐसे अनेकों उदाहरण से भरा हुआ है । जीवन की प्रत्येक स्थिति में किस प्रकार आचरण करना चाहिए, इसका पथ-प्रदर्शन रामचरितमानस सहजता से कर देता है।
यह जीवन के हर आयाम में मार्गदर्शन करता है । श्रीरामचरितमानस आदर्श गृहस्थ जीवन, आदर्श राजधर्म, आदर्श पारिवारिक जीवन, आदर्श पतिव्रत धर्म और आदर्श भ्रातृ धर्म का बोध कराता है। इसके अतिरिक्त यह भक्ति, ज्ञान, त्याग, वैराग्य और सदाचार के नैतिक मूल्यों को भी समेटे हुए है। इसमें स्त्री-पुरुष, बालक, युवा और वृद्ध सभी के लिए उपदेश निहित हैं।
सगुण-साकार भगवान की आदर्श मानव लीला, उनके गुण, प्रभाव, रहस्य तथा प्रेम के गहन तत्व को तुलसीदास जी ने सरल और रोचक शैली में प्रस्तुत किया है। यही कारण है कि यह ग्रंथ हर युग और हर परिस्थिति में प्रासंगिक बना रहता है।
वर्तमान समय में इसकी आवश्यकता, इसका महत्त्व और अधिक बढ़ जाता है। आज जब चारों ओर हिंसा और अशांति व्याप्त है, जब मानव-मानव के बीच अविश्वास और स्वार्थ की दीवारें खड़ी हो गई हैं, जब विज्ञान की शक्ति का अधिकांश भाग विनाश के साधनों को विकसित करने में व्यर्थ हो रहा है, ऐसे समय में सुख, शांति और प्रेम का संदेश अत्यंत आवश्यक है।
श्रीरामचरितमानस का अध्ययन और उसका जीवन में अनुपालन व्यक्ति को मानसिक तनाव से मुक्ति दिलाता है। यह सोचने-समझने और निर्णय लेने की क्षमता में उदारता लाता है। यदि इसके विचारों को आत्मसात किया जाए तो जीवन सरल, शांत और संतुलित बन सकता है।
साथ ही तुलसीदास जी की विनम्रता का भाव हमें सदैव प्रेरणा देता है । कई लोग यह दावा कर सकते हैं कि उन्होंने श्रीरामचरितमानस का पूर्ण अध्ययन कर लिया है और उसके प्रत्येक शब्द व अक्षर का भाव समझ लिया है। किंतु यह कहना अपने-आप में अतिशयोक्ति होगा। तुलसीदास जी स्वयं कहते हैं-
कबि न होऊँ नहिं चतुर कहावउँ । मति अनुरूप राम गुन गावउँ ।।
कहँ रघुपति के चरित अपारा । कहँ मति मोरि निरत संसारा ।।
अर्थात्, “मैं न तो कवि हूँ और न चतुर कहलाता हूँ। अपनी बुद्धि के अनुसार श्रीरामजी के गुणों का गाता हूँ। कहाँ तो श्रीरघुनाथजी के अपार चरित्र, कहाँ संसार में आसक्त मेरी बुद्धि।
यहाँ जिस ग्रंथ की चर्चा हो रही है, वह गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित तथा परम श्रद्धेय हनुमानप्रसाद पोद्दार द्वारा टीकाकार श्रीरामचरितमानस है। यह केवल हिंदी में ही नहीं, बल्कि उड़िया, तेलुगु, मराठी, गुजराती, कन्नड़, अंग्रेज़ी, नेपाली और असमिया सहित अनेक भाषाओं में प्रकाशित होता है। श्रीरामचरितमानस की शुरुआत परायण की विधि से होती है। इसके बाद क्रमशः बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, लंकाकाण्ड एवं अंत में उत्तरकाण्ड है । प्रत्येक दोहे एवं अक्षर का अपना-अपना महत्त्व है ।
बालकांड के एक प्रसिद्ध दोहे (दोहा संख्या 5) में श्रीमद् गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं-
भलो भलाइहि पै लहइ निचाइहि नीचु ।
सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचू ।।
अर्थात्, “भला भलाई ही ग्रहण करता है, और नीच नीचता को ही ग्रहण किये रहता है। अमृत की सराहना अमर करने में है और विष की मारने में।”
यह दोहा जीवन का गूढ़ सत्य उजागर करता है, व्यक्ति वही ग्रहण करता है, जो उसके स्वभाव के अनुकूल होता है।
यदि आप श्रीरामचरितमानस को केवल एक धार्मिक ग्रंथ मानकर देख रहे हैं, तो दृष्टिकोण बदलने की आवश्यकता है। चाहे आप किसी भी पंथ या पूजा-पद्धति को मानते हों, भले ही प्रभु श्रीराम में आस्था न रखते हों, फिर भी आदर्श जीवन शैली का इससे बड़ा और प्रत्यक्ष उदाहरण मिलना कठिन है।
इसका अध्ययन और इसमें दिए गए आदर्शों का पालन न केवल सुख-शांति को बढ़ाता है, बल्कि मानसिक तनाव से मुक्ति भी दिलाता है। यह व्यक्ति को निर्णय लेने में विवेकशील और उदार बनाता है। अंततः जीवन आपका है और निर्णय भी आपको ही करना है कि आपको किस पथ का अनुसरण करना है।
डॉ. प्रशान्त कुमार मिश्र
(सामाजिक चिन्तक एवं विचारक)
जिला- मुरादाबाद
सम्पर्क सूत्र- 7599022333



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